तुर्की के अंताल्या शहर में 9 से 20 नवंबर 2026 में होने वाले संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (COP31) से ठीक पहले ऑस्ट्रेलिया और प्रशांत द्वीप देशों में युवा कार्यकर्ताओं, छात्रों और सामान्य लोगों दुआरा (Pacific Islands) एक जलवायु संकट विरोध प्रदर्शन आंदोलन चलाया जा रहा है जिसे कि 'नो कॉप-आउट्स एट COP31: क्लाइमेट एक्शन नाउ' के नाम से जाना जाता है और जो वैश्विक स्तर पर ठोस कार्रवाई की मांग कर रहा है। इस आंदोलन का उद्देश्य सरकारों को खोखले वादों (कॉप-आउट्स) से रोकना और वास्तविक जमीनी बदलाव लाना है।
(इमेज
साभार –Energy efficiency
movement)
24 अक्टूबर 2026 को गैडिगल कंट्री (Gadigal Country) स्थित सिडनी टाउन हॉल में
आयोजित 'नो कॉप-आउट्स एट COP31: क्लाइमेट एक्शन नाउ' की रैली में फिजी की एक
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार वकील और नारीवादी जलवायु कार्यकर्ता कविता नायडू ने भाषण
दिया, जिसे कि जरुर जानना /पढना चाहिए. भाषण का अनुवाद यंहा दिया जा रहा है –
(इमेज साभार –Green Left)
पैसिफिक (प्रशांत क्षेत्र) के लिए, तापमान का 1.5 डिग्री से ऊपर जाना एक मौत की सजा
जैसा है, जिस पर हम चुप नहीं बैठेंगे।
1.5 डिग्री की यह सीमा न केवल इंटरनेशनल
कोर्ट ऑफ जस्टिस (ICJ) में तय की गई है, बल्कि पैसिफिक देशों ने 'इंटरनेशनल ट्रिब्यूनल फॉर द लॉ ऑफ द सी' और 'इंटर-अमेरिकन कोर्ट ऑफ ह्यूमन राइट्स' में भी इसी सीमा की वकालत की थी।
पहली बार हमारे पास एक मजबूत कानूनी
आधार है। ऑस्ट्रेलिया में चल रहे कुछ कानूनी मामले यह स्पष्ट करेंगे कि इन सलाहकारी
राय (advisory opinions) का व्यावहारिक अर्थ क्या है।
पैसिफिक क्षेत्र 'गलत जलवायु समाधानों' को खारिज करता है।
फिजी में होने वाले 'प्री-COP' से पहले, पैसिफिक क्षेत्र के सामुदायिक संगठनों
ने तुवालु में बैठक की और 'क्लाइमेट जस्टिस' (जलवायु न्याय) के लिए 'फुनाफुती कॉल' (Funafuti Call) जारी किया, जो पैसिफिक के लोगों की आवाज है। उनका
मुख्य नारा था: "तुवालु खोया, तो समझो हमारी दुनिया खो गई।"
(इमेज साभार -Global Times)
पैसिफिक क्षेत्र मांग कर रहा है कि
कोयला, तेल और गैस का इस्तेमाल तुरंत बंद किया
जाए। साथ ही, नए संसाधनों की खोज, लाइसेंसिंग, विस्तार और सब्सिडी पर भी रोक लगे।
इसमें विकसित देशों को सबसे पहले और सबसे तेजी से कदम उठाने चाहिए।
हम सभी 'गलत समाधानों'
को खारिज करते हैं—जिनमें कार्बन कैप्चर एंड स्टोरेज, परमाणु ऊर्जा, ऑफसेटिंग, जियो-इंजीनियरिंग और 'मैनेज्ड ट्रांजिशन पाथवे' (उत्पादन कम करने के बजाय अपनाए जाने
वाले अन्य तरीके) शामिल हैं।
हम गहरे समुद्र में खनन (deep-sea mining) को खारिज करते हैं। हम 'ग्रीन और ब्लू उपनिवेशवाद' पर आधारित उस 'न्यायसंगत बदलाव' (just transition) को भी नहीं मानते, जो विकसित देशों की ऊर्जा जरूरतों को
पूरा करने के लिए जमीन और महासागरों पर लोगों के अधिकारों को छीनने का रास्ता
खोलता है।
यह बदलाव किसके लिए है? और किसलिए है? हम ऊर्जा की खपत को समस्या नहीं मान
रहे हैं, बल्कि हम ऊर्जा के स्रोतों पर ध्यान दे
रहे हैं—और हमें इससे आगे सोचने की जरूरत है।
आप 'ग्लोबल नॉर्थ'
की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए 'ग्लोबल साउथ' को बर्बाद नहीं कर सकते और न ही वहां
से संसाधनों का दोहन कर सकते हैं; यह न तो न्यायपूर्ण है और न ही उचित।
हमें यह पूरी तरह समझ नहीं आता—क्योंकि इसमें बहुत कुछ 'ग्रीनवाशिंग' (पर्यावरण के प्रति जागरूक होने का
दिखावा) है—लेकिन दुर्लभ खनिजों (rare earth minerals) के लिए मची यह होड़ सिर्फ सोलर पैनल
बनाने के लिए नहीं है; यह इस क्षेत्र के सैन्यीकरण (militarisation) से जुड़ी है। इसका संबंध मिसाइलों और
ड्रोनों से है। आपको बस यह देखना है कि ऑस्ट्रेलियाई सरकार सैन्यीकरण पर अरबों
डॉलर खर्च कर रही है, क्योंकि वे हमारी ज़मीन और महासागरों
पर कब्ज़ा करना चाहते हैं और इन संसाधनों की रक्षा के लिए उन्हें एक सेना की
ज़रूरत है।
'फुनाफाटी कॉल' (Funafati Call) प्रशांत क्षेत्र के सैन्यीकरण, सुरक्षा-केंद्रित दृष्टिकोण और
परमाणुकरण को खारिज करती है। इसमें AUKUS, पापुआ न्यू गिनी-ऑस्ट्रेलिया आपसी रक्षा संधि (जिसे 'पुकपुक संधि' भी कहा जाता है) और 'वुवाले यूनियन' (Vuvale Union) को हमारे आर्थिक संसाधनों पर नियंत्रण
पाने और हमें ऑस्ट्रेलियाई सरकार की मांगों के आगे झुकने के लिए मजबूर करने की
कोशिशों के रूप में देखा गया है।
(इमेज साभार –Instagram-civilsocietyforumtonga)
हम अपने जलक्षेत्र में होने वाले सभी
मिसाइल परीक्षणों की निंदा करते हैं, और भविष्य में होने वाले किसी भी तरह के हथियारों के परीक्षण का भी
विरोध करते हैं।
हम अपने द्वीपों पर सम्मान के साथ रहने
के अपने अधिकार पर ज़ोर देते हैं। हम ऐसे किसी भी समझौते को खारिज करते हैं, जो हमारे लोगों की संप्रभुता और
सुरक्षा के बदले में आवाजाही (mobility) की सुविधा देते हों।
प्रशांत क्षेत्र एक ऐसा इलाका है जिस
पर आज भी कब्ज़ा है। पश्चिमी पापुआ, गुआम, कनाकी और ताहिती में 'आत्मनिर्णय' (self-determination) के लिए संघर्ष जारी हैं।
हम 'जलवायु न्याय'
(climate justice) के बारे में तब तक बात नहीं कर सकते, जब तक कि हम उन मूल निवासियों के 'आत्मनिर्णय'
के अधिकार को मान्यता न दें, जो इस क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के
सबसे बुरे प्रभावों का सामना सबसे आगे रहकर कर रहे हैं।
यही कारण है कि हमें अपने प्रशांत
क्षेत्र के नेताओं से सवाल पूछना चाहिए, जो संयुक्त राष्ट्र में इज़राइल का समर्थन करके ज़ायनवाद (Zionism) को बढ़ावा दे रहे हैं, इस क्षेत्र में इज़राइली दूतावास खुलवा
रहे हैं और "विकास सहयोग" (development cooperation) के समझौतों पर हस्ताक्षर कर रहे हैं।
हम नरसंहार करने वाले एक देश (इज़राइल)
का समर्थन करने को खारिज करते हैं और अपने द्वीपों से ज़ायनिस्ट कट्टरवाद के खतरे
को खत्म करने का संकल्प लेते हैं।
प्रशांत क्षेत्र के बारे में एक और बात
है जिसे लोग नहीं समझते—यहाँ महिलाओं के खिलाफ हिंसा की दर
दुनिया में सबसे ज़्यादा है। हम मानते हैं कि हमें अपने 'जलवायु न्याय' अभियानों में 'लैंगिक न्याय' (gender justice) को भी शामिल करना होगा।
इसमें बिना वेतन वाले देखभाल कार्यों (unpaid care work) को मान्यता देना और उनका पुनर्वितरण
करना, सामाजिक सुरक्षा की गारंटी देना, तथा लैंगिक हिंसा और यौन व प्रजनन
स्वास्थ्य अधिकारों पर ध्यान देना शामिल है।
प्रशांत क्षेत्र इस बात को समझने में
भी काफी आगे रहा है कि 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' (AI) और डेटा सेंटर हमारे लिए क्या
चुनौतियां लेकर आ रहे हैं। हमारे यहाँ पहले से ही डेटा सेंटर बन रहे हैं, समुद्र के नीचे केबल बिछाई जा रही हैं
और अन्य डिजिटल बुनियादी ढाँचे तैयार किए जा रहे हैं, लेकिन इनके कारण कितनी ऊर्जा और पानी
की खपत हो रही है या कितना उत्सर्जन (emissions) हो रहा है, इसका खुलासा नहीं किया जा रहा है।
प्रशांत क्षेत्र 'डेटा संप्रभुता' (data sovereignty) की मांग करता है और AI से मूल निवासियों के पारंपरिक ज्ञान की
सुरक्षा पर ज़ोर देता है। हम AI के दोहरे उद्देश्यों पर भी सवाल उठाते हैं, खासकर इसके सैन्य निगरानी और खुफिया
जानकारी जुटाने के लिए इस्तेमाल किए जाने पर। हम अपने क्षेत्र में बुनियादी ढांचा
उपलब्ध कराकर दुनिया के अन्य हिस्सों में लोगों की हत्या में भागीदार नहीं बनेंगे।
इस क्षेत्र में ऑस्ट्रेलिया की भूमिका
ICJ (अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय) के फैसले के
अनुसार, जो देश जलवायु की रक्षा करने में विफल
रहता है, वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक गलत काम
कर रहा हो सकता है। ऐसा करने वाले देश को तुरंत रुकना होगा, यह गारंटी देनी होगी कि वह ऐसा दोबारा
नहीं करेगा, और पूरा हर्जाना देना होगा।
हम ऑस्ट्रेलिया पर आरोप लगाते हैं कि
उसने न केवल अपना वादा तोड़ा है, बल्कि अपने ही कानूनों और अपने पड़ोसियों के भरोसे को भी तोड़ा है।
वह प्रशांत क्षेत्र के देशों से कहता है कि वे एक "परिवार" हैं, लेकिन साथ ही पाखंड करते हुए ऐसे नए
जीवाश्म ईंधन (fossil
fuel) प्रोजेक्ट्स
को मंजूरी देता रहता है, जो हमारे घरों को डुबो रहे हैं।
ऑस्ट्रेलिया की जलवायु नीति असल में
जीवाश्म ईंधन निर्यात की नीति है, जिस पर बस दिखावे के लिए एक जलवायु रणनीति चिपका दी गई है। वह एक हाथ
से जलवायु समाधान देने का नाटक करता है, जबकि दूसरे हाथ से संकट को और बढ़ाता है।
ऑस्ट्रेलिया ने इस साल अपनी सेना पर 62.6 अरब डॉलर खर्च किए हैं, और 2033 तक सैन्य खर्च को अपने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 3% तक बढ़ाने का वादा किया है। AUKUS (ऑकस) समझौते पर 30 सालों में 400 अरब डॉलर से ज्यादा का खर्च आएगा।
और यह 'युद्ध मशीन'
(सैन्य
तंत्र) हमारे ग्रह को जला रही है। रक्षा विभाग सार्वजनिक क्षेत्र के कुल उत्सर्जन
(emissions) का एक बड़ा हिस्सा पैदा करता है, लेकिन 2012 से उसने उत्सर्जन का विस्तृत डेटा जारी करने से इनकार कर दिया है।
इस रिपोर्टिंग में कभी भी सैन्य आपूर्ति श्रृंखलाओं (military supply chains) से होने वाला उत्सर्जन शामिल नहीं किया
जाता।
यह कोई भूल नहीं है। सरकारें 'नेट ज़ीरो' (net zero) की बातें तो करती हैं, लेकिन अपने सैन्य उत्सर्जन को कभी नहीं
गिनतीं।
ऑस्ट्रेलियाई सरकार प्रदूषण फैलाने
वालों को पैसे देती रहती है, जबकि उसे प्रशांत क्षेत्र और अन्य प्रभावित देशों को उस नुकसान के
लिए जलवायु हर्जाना देना चाहिए जो उसने खुद पहुँचाया है। उसने 2025-26 में जीवाश्म ईंधन सब्सिडी पर 16.3 अरब डॉलर खर्च किए, जबकि उसका दावा है कि देखभाल, विकलांगता, और हुए नुकसान की भरपाई के लिए उसके
पास पैसे नहीं हैं।
पिछले साल अक्टूबर में, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका ने रक्षा और
उन्नत तकनीक के लिए आपूर्ति श्रृंखलाओं को सुरक्षित करने हेतु 'क्रिटिकल मिनरल्स फ्रेमवर्क' (महत्वपूर्ण खनिज ढांचा) पर हस्ताक्षर
किए। इसमें पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया (WA) में गैलियम रिफाइनरी सहित 8.5 अरब डॉलर की परियोजनाओं को समर्थन दिया गया।
ऑस्ट्रेलियाई कंपनियों की मिलीभगत
हम ऑस्ट्रेलियाई सरकार, सार्वजनिक पेंशन फंड और प्राकृतिक
संसाधनों का दोहन करने वाले उद्योगों पर आरोप लगाते हैं कि वे 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील देशों) में हिंसा को बढ़ावा
दे रहे हैं। खोजी पत्रकारों के एक अंतरराष्ट्रीय संघ द्वारा किए गए शोध में 33 अफ्रीकी देशों में लगभग 1500 लाइसेंस रखने वाली 150 से अधिक सार्वजनिक रूप से सूचीबद्ध
ऑस्ट्रेलियाई खनन कंपनियों की पहचान की गई है।
इन कंपनियों पर सैकड़ों श्रमिकों और
समुदाय की मौतों, पर्यावरण प्रदूषण, विस्थापन और श्रम शोषण में शामिल होने
का आरोप है।
ओके टेडी ने पापुआ न्यू गिनी में एक
नदी प्रणाली को प्रदूषित किया; ब्राजील में मारियाना बांध के ढहने के लिए बीएचपी जिम्मेदार थी; रियो टिंटो के स्वामित्व वाली पंगुइना
खदान ने बोगेनविले में विषाक्त विरासत छोड़ी और कंपनी ने पांच दशकों तक इसे
स्वीकार करने से इनकार किया; रियो टिंटो की खदानों ने मेडागास्कर के सबसे गरीब क्षेत्रों में से
एक, अनोसी क्षेत्र में पीने के पानी को
प्रदूषित किया है; पर्थ स्थित एनविल नामक कंपनी द्वारा
डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो के किल्वा में 70 लोगों का नरसंहार किया गया, जिसने अपने कर्मचारियों का इस्तेमाल सैनिकों को ले जाने के लिए किया, और ऑस्ट्रेलिया में इसकी कोई जवाबदेही
नहीं है; और यह सूची जारी है।
ऑस्ट्रेलियाई कंपनियां विदेशों में ऐसे
व्यवहार से बच निकलती हैं जिनसे वे यहां कभी नहीं बच सकतीं। वे मेरे गृह देश और
पूरे वैश्विक दक्षिण में ऐसा करती हैं। इसका नुकसान हमेशा स्वदेशी लोगों, जीवन रक्षा और पुनर्निर्माण का भार
उठाने वाली महिलाओं और द्वीपीय राष्ट्रों पर पड़ता है।
यह पूंजीवाद की रक्षा के प्रति जुनूनी
उपनिवेशवादी व्यवस्था की सोची-समझी साजिश है।
प्रशांत क्षेत्र ने जलवायु परिवर्तन को
अपनी सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया। कैनबरा ने उनकी बात सुनी और परमाणु
पनडुब्बियां खरीद लीं।
सैन्यवाद और दोहनवाद दो अलग-अलग बातें
नहीं हैं। एक संसाधनों का दोहन करता है, दूसरा उनकी रक्षा करता है। दोनों प्रशांत क्षेत्र को संरक्षित किए
जाने वाले क्षेत्र के रूप में देखते हैं, न कि संरक्षित किए जाने वाले लोगों के रूप में।
जब प्रशांत क्षेत्र नुकसान और
क्षतिपूर्ति के लिए वित्तीय सहायता मांगता है, तो उसे बताया जाता है कि खजाना खाली है। युद्ध मशीन के लिए हमेशा एक
अरब डॉलर और होते हैं। हम महत्वाकांक्षा नहीं मांग रहे हैं। हम समाप्ति की मांग कर
रहे हैं। कोई नया कोयला और गैस नहीं। कोई लाइसेंस नहीं। कोई मंजूरी नहीं। सब्सिडी
बंद करो। बकाया चुकाओ।
हमें दुनिया भर में जो हो रहा है, उसका अनुसरण करने की जरूरत है, हमें बड़े पैमाने पर लामबंद होने, व्यवधान पैदा करने और आक्रोश व्यक्त
करने की जरूरत है। और हमें इसकी अभी जरूरत है।
(सन्दर्भ /साभार –Greenleft )
जल से संबंधित सूचनाओ, समाचारों और सन्दर्भों का संकलन–पानी -पत्रक
पानी पत्रक- 344 ( 07 नवम्बर 2026 ) जलधारा अभियान-जयपुर -संपर्क- उपेन्द्र शंकर-7597088300.मेल-jaldharaabhiyan.jaipur@gmail.com. वेबसाइट-जलधारा अभियान –राजस्थान ,



