पुरुलिया में 'शाकंभरी इस्पात
एंड पावर लिमिटेड' के लिए प्रशासन द्वारा एक गुप्त और पहले से तय
(स्टेज-मैनेज्ड) जनसुनवाई आयोजित करने का आरोप लगाते हुए, ग्रामीणों ने
स्टेट हाईवे को जाम कर दिया। उन्होंने वायु प्रदूषण, पानी की कमी, कृषि भूमि के
नुकसान और पहले से ही प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों के बीच रह रहे लोगों के
स्वास्थ्य को लेकर चिंता जताई
पश्चिम बंगाल के
पुरुलिया जिले के रघुनाथपुर उप-मंडल के कई गांवों के निवासियों ने,28 अक्टूबर 2026, बुधवार को 'शाकंभरी इस्पात
एंड पावर लिमिटेड' के प्रस्तावित 10,000 करोड़ रुपये के
स्टील और पावर कॉम्प्लेक्स के लिए आयोजित जनसुनवाई के विरोध में
रघुनाथपुर-संतालडीही स्टेट हाईवे को जाम कर दिया। ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन
ने भारी पुलिस बल तैनात करके, रास्ते में बैरिकेड लगाकर और मुख्य गेट पर ताला
डालकर उन्हें जनसुनवाई से बाहर रखा। वहीं, कंपनी द्वारा
चुने गए कुछ चुनिंदा लोगों को अंदर जाने दिया गया, ताकि एक 'दिखावटी' जनसुनवाई आयोजित करके परियोजना के लिए लोगों की
सहमति का ढोंग रचा जा सके।
( पुलिस के एक
बड़े दल ने SDO कार्यालय तक जाने वाले रास्ते की घेराबंदी कर
दी और मुख्य द्वार पर ताला लगा दिया )
दोपहर के लिए तय
की गई इस जनसुनवाई ने उस इलाके में पुराने डर को फिर से ताजा कर दिया है, जो पहले से ही भारी औद्योगिकरण की चपेट में है।
यहाँ के लोग सालों से औद्योगिक प्रदूषण के नतीजों को झेल रहे हैं और अब उन्हें
अपने पानी, कृषि भूमि और स्वास्थ्य पर मंडरा रहे नए खतरों
की चिंता सता रही है।
उसी दिन जारी एक
आपातकालीन प्रेस विज्ञप्ति में, 'फोरम फॉर अपोजिशन टू पॉल्यूशन एंड प्रोटेक्शन
ऑफ लाइफ एंड नेचर' ने बताया कि दुरमुत, हुरा, निलडी, मणिपुर, केवाबाथन, जोराडी, झारुखमार और
लयेकडी गांवों के ग्रामीण सुबह 11 बजे से पहले ही SDO कार्यालय पहुंच गए थे। वे जनसुनवाई में हिस्सा
लेना चाहते थे, जिसे वे अपना संवैधानिक अधिकार मानते हैं, क्योंकि यह उनके जीवन और आजीविका के भविष्य को
तय करने वाली थी। लेकिन वहां पहुंचने पर उन्होंने पाया कि उनके और इस प्रक्रिया के
बीच पुलिस के बैरिकेड और एक बंद गेट खड़ा था।
( ग्रामीणों ने दिखावटी जनसुनवाई के विरोध में
सड़क पर बैठकर प्रदर्शन किया)
बिना सूचना या अनुवाद के सुनवाई
फोरम ने यह भी
आरोप लगाया कि यह सुनवाई बिना किसी उचित सार्वजनिक सूचना के आयोजित की गई थी। उनके
बयान के अनुसार, अनिवार्य 30 दिनों की सूचना
अवधि के दौरान प्रभावित गांवों में लाउडस्पीकर से कोई घोषणा नहीं की गई, न ही सार्वजनिक सूचना देने के किसी पारंपरिक
तरीके का इस्तेमाल किया गया और न ही कोई पोस्टर लगाए गए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया
कि मुख्य रूप से आदिवासी आबादी वाले इन गांवों के निवासियों को परियोजना से जुड़े
दस्तावेज बंगाली भाषा में, या संताली भाषा की 'ओल चिकी' लिपि में उपलब्ध नहीं कराए गए। इससे सबसे
ज्यादा प्रभावित होने वाले लोग यह समझने के किसी भी सार्थक साधन से वंचित रह गए कि
आखिर क्या प्रस्ताव रखा जा रहा है।
ये आरोप पूरी
प्रक्रिया के मूल पर सवाल उठाते हैं। 'पर्यावरण प्रभाव
आकलन अधिसूचना, 2006' (Environment Impact Assessment
Notification, 2006) के तहत, सार्वजनिक सुनवाई वह मुख्य चरण है जहां
परियोजना से प्रभावित होने वाले लोग, पर्यावरण मंजूरी
(environmental clearance) पर विचार किए जाने से पहले, अपनी चिंताओं को आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज करा
सकते हैं। इस अधिसूचना के अनुसार, कम से कम 30 दिन पहले सूचना
देना और स्थानीय भाषा में 'ड्राफ्ट EIA रिपोर्ट' का सारांश उपलब्ध कराना अनिवार्य है। फोरम का
तर्क है कि जिस सुनवाई से प्रभावित जनता को ही बाहर रखा जाए, उसे वास्तव में 'सुनवाई' माना ही नहीं जा सकता। इसलिए, उन्होंने मांग की है कि इस पूरी प्रक्रिया को
रद्द किया जाए और परियोजना की 'पर्यावरण प्रभाव आकलन' (EIA) रिपोर्ट को खारिज कर दिया जाए।
घरों, स्कूलों और जंगलों के बगल में औद्योगिक विस्तार
प्रस्तावित
कॉम्प्लेक्स में 2.73 मिलियन टन क्षमता वाला एक स्टील प्लांट, 0.54 मिलियन टन प्रति वर्ष क्षमता वाली एक
फेरो-अलॉय यूनिट, 2 मिलियन टन प्रति वर्ष क्षमता वाला एक सीमेंट
प्लांट और 484 मेगावाट का एक पावर प्लांट शामिल होगा।
प्रेस विज्ञप्ति
के अनुसार, यह सुविधा हुरा गांव के ठीक बगल में स्थित
होगी। परियोजना की सीमा से केवाबथन लगभग 140 मीटर, निल्डी 380 मीटर, दुरमुत 400 मीटर और मणिपुर
420 मीटर की दूरी पर हैं। बताया गया है कि हुरा
प्राइमरी स्कूल इस जगह से लगभग 150-160 मीटर दूर है और
निल्डी हाई स्कूल लगभग 410-430 मीटर दूर है। इसके अलावा, प्रस्तावित परियोजना से 200 मीटर से लेकर 1.7 किलोमीटर की
दूरी के भीतर सात संरक्षित वन क्षेत्र मौजूद हैं।
फोरम ने चेतावनी
दी है कि यह प्लांट उस इलाके में प्रदूषण के कुल बोझ को और बढ़ा देगा, जो पहले से ही बड़े प्रदूषणकारी उद्योगों से
घिरा हुआ है। इसने दुरमुत मौजा के 10 किलोमीटर के
दायरे में पांच बड़ी 'रेड-कैटेगरी' (अत्यधिक
प्रदूषणकारी) औद्योगिक इकाइयों की पहचान की है:
शाकंभरी इस्पात
एंड पावर, नक्षित आयरन एंड स्टील, ओडिशा अलॉय स्टील/ओडिशा मेटालिक्स, दामोदर वैली कॉरपोरेशन का रघुनाथपुर थर्मल पावर
स्टेशन और श्याम स्टील। नक्षित आयरन एंड स्टील, जिसकी अपनी
परियोजना भी अभी प्रस्ताव के चरण में है, शाकंभरी साइट से
केवल 600 मीटर की दूरी पर स्थित बताई जाती है।
फोरम का आरोप है
कि शाकंभरी की EIA (पर्यावरण प्रभाव आकलन) रिपोर्ट में इलाके की
अन्य प्रस्तावित औद्योगिक सुविधाओं के बारे में जानकारी छिपाई गई है और उनके
संयुक्त प्रभाव का आकलन करने का कोई प्रयास नहीं किया गया है। इससे यह सवाल उठता
है कि क्या रघुनाथपुर में कई बड़ी औद्योगिक इकाइयों के हवा की गुणवत्ता, जल संसाधनों, वनों और
सार्वजनिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले कुल प्रभावों का कभी आकलन किया भी गया है या
नहीं।
सूखा-प्रवण जिले
में पानी की भारी खपत वाला उद्योग
ग्रामीणों की
सबसे बड़ी चिंताओं में से एक यह है कि औद्योगिक विस्तार का उन जल संसाधनों पर क्या
असर पड़ेगा, जो पहले से ही भारी दबाव में हैं। पुरुलिया एक
सूखा-प्रवण (सूखे की आशंका वाला) जिला है, और यहां के कई
गांव अपनी दैनिक जरूरतों के लिए कुओं, तालाबों और
ट्यूबवेलों पर निर्भर हैं, खासकर गर्मियों के महीनों में। फोरम का दावा है
कि इस इलाके में मौजूद पांच प्रमुख औद्योगिक इकाइयां मिलकर पंचेत बांध और दामोदर
नदी से रोजाना 251,324 से 361,724 किलोलीटर पानी
निकाल सकती हैं।
बयान में यह भी
आरोप लगाया गया है कि प्रस्तावित परियोजना की सीमा के भीतर मौजूद लगभग 15 तालाब, और इस इलाके से
होकर बहने वाली उत्तला नदी, पूरी तरह नष्ट हो सकती हैं या उन्हें भारी
नुकसान पहुंच सकता है। फोरम का कहना है कि ये जल स्रोत भूजल (groundwater) को रिचार्ज करते हैं, जिस पर आसपास के गांव निर्भर हैं। साथ ही, ये जल स्रोत भेड़ियों, सियार, अजगर और मोरों
जैसे वन्यजीवों के लिए भी जीवन का आधार हैं।
फोरम ने
परियोजना क्षेत्र में मौजूद कृषि भूमि को लेकर भी चिंता जताई है। उनका दावा है कि
किसानों की 39.78 हेक्टेयर (लगभग 98.31 एकड़) निजी खेती की जमीन का अभी तक अधिग्रहण
नहीं किया गया है, और EIA रिपोर्ट में इस
जमीन की स्थिति को लेकर विरोधाभासी जानकारी दी गई है।
स्थानीय
निवासियों में सिलिकोसिस और अन्य बीमारियों को लेकर चिंता
प्रेस विज्ञप्ति
में आरोप लगाया गया है कि रघुनाथपुर औद्योगिक क्षेत्र के निवासी और कर्मचारी पहले
से ही सिलिकोसिस, क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिसीज (COPD) और अस्थमा जैसी बीमारियों से जूझ रहे हैं। इसका
कारण औद्योगिक धूल और उत्सर्जन है। प्रभावित लोगों में से कई ऐसे हैं जिन्हें उचित
चिकित्सा सुविधा भी नहीं मिल पा रही है। इस क्षेत्र में सिलिकोसिस पर बीबीसी
न्यूज़ की पिछली रिपोर्टों का हवाला देते हुए, मंच ने मांग की
है कि किसी भी नए औद्योगिक विस्तार की अनुमति देने से पहले एक व्यापक स्वास्थ्य
ऑडिट (health audit) कराया जाए। उनका तर्क है कि मौजूदा बीमारी के
बोझ का आकलन किए बिना किसी और बड़े औद्योगिक परिसर को मंजूरी देने से, पहले से ही कमजोर समुदायों के लिए खतरा और भी
बढ़ जाएगा।
स्वास्थ्य
संबंधी ये चिंताएं, इस क्षेत्र में औद्योगीकरण की पर्यावरणीय और
सामाजिक कीमत को लेकर चल रहे व्यापक विवाद का हिस्सा हैं। यहां के समुदायों को डर
है कि निवेश और रोजगार के वादे की कीमत उन्हें अपनी साफ हवा, सुरक्षित पानी, कृषि-आधारित
आजीविका और स्वास्थ्य को खोकर चुकानी पड़ेगी।
पर्यावरणीय आकलन
में गंभीर खामियों का आरोप
मंच ने EIA (पर्यावरण प्रभाव आकलन) रिपोर्ट तैयार करने और
उसे सार्वजनिक करने के तरीके पर भी सवाल उठाए हैं। प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, केंद्र सरकार ने 16 अगस्त, 2026 को इस परियोजना
के लिए 'टर्म्स ऑफ रेफरेंस' (ToR) जारी किए थे, और लगभग छह
दिनों के भीतर, 22 अगस्त तक 550 पन्नों की EIA ड्राफ्ट रिपोर्ट तैयार कर ली गई। मंच का आरोप
है कि ToR में तय की गई 20 विशिष्ट शर्तों
में से 14 शर्तों को सुनवाई से पहले जनता से छिपाकर रखा
गया था।
इसके अलावा, मंच का दावा है कि रिपोर्ट में परियोजना की जगह
को गलत तरीके से छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में बताया गया है। इससे संकेत मिलता है
कि किसी दूसरी परियोजना की रिपोर्ट से सामग्री को सीधे इस दस्तावेज़ में कॉपी कर
लिया गया है। इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है; लेकिन अगर ये सच साबित होते हैं, तो रिपोर्ट में बताई गई ये कमियां और गलतियां
पर्यावरणीय आकलन की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े करेंगी। साथ ही, सुनवाई से पहले स्थानीय निवासियों को दी गई
जानकारी की सत्यता पर भी सवाल उठेंगे। निवासियों ने जनसुनवाई रद्द करने की मांग की.
फोरम ने बताया
कि SDO कार्यालय में प्रवेश से रोके जाने के बाद, उन्होंने 28 अक्टूबर की
दोपहर को जिला प्रशासन और केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु
परिवर्तन मंत्रालय को ईमेल के जरिए एक लिखित कानूनी आपत्ति भेजी। उनकी मांगों में
जनसुनवाई को तुरंत रद्द करना, कथित तौर पर त्रुटिपूर्ण EIA रिपोर्ट को खारिज करना, और इस प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों व
संगठनों के आचरण की उच्च-स्तरीय जांच कराना शामिल है।
बयान में यह भी
याद दिलाया गया कि 4 अगस्त, 2026 को 'नक्षित आयरन एंड स्टील' से जुड़ी जनसुनवाई के दौरान भी निवासियों को
इसी SDO कार्यालय के बाहर रोक दिया गया था। फोरम ने इन
दोनों घटनाओं को एक ऐसे पैटर्न का सबूत बताया है, जिसमें प्रदूषण
फैलाने वाली औद्योगिक परियोजनाओं का विरोध करने वाले समुदायों की आवाज़ दबाने के
लिए पुलिस बल का इस्तेमाल किया जाता है।
रघुनाथपुर की ये
घटनाएं पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में औद्योगिक परियोजनाओं को लेकर
एक बुनियादी सवाल खड़ा करती हैं: क्या जनसुनवाई का कोई मतलब रह जाता है, जब सबसे अधिक प्रभावित लोग यह आरोप लगाएं कि
उन्हें इस प्रक्रिया में शामिल होने से रोका गया और उनकी आपत्तियों को दबा दिया
गया? इन गांवों के निवासियों की मांग सिर्फ यह नहीं
है कि एक नई जनसुनवाई आयोजित की जाए, बल्कि वे एक ऐसी
प्रक्रिया चाहते हैं जिसमें वे सार्थक रूप से भाग ले सकें और अपनी जमीन, पानी, जंगलों तथा
स्वास्थ्य के भविष्य को लेकर अपनी बात रख सकें।
( सन्दर्भ /साभार –Groundxero की रिपोर्ट का अनुवाद )
जल से संबंधित सूचनाओ, समाचारों और सन्दर्भों का संकलन–पानी -पत्रक
पानी पत्रक- 343 (31 अक्टूबर 2026 ) जलधारा अभियान-जयपुर -संपर्क- उपेन्द्र शंकर-7597088300.मेल-jaldharaabhiyan.jaipur@gmail.com. वेबसाइट-जलधारा अभियान –राजस्थान ,



