शनिवार, 25 अप्रैल 2026

पन्ना के सैकड़ों गांवों में गहराया जल संकट- पानी की व्यवस्था करना सबसे बड़ी चुनौती

 बुंदेलखंड क्षेत्र में हर साल की तरह इस बार ( यानि अप्रैल 2026 ) भी गर्मी की शुरुआत के साथ ही जल संकट गहराने लगा है। मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में हालात बेहद चिंताजनक होते जा रहे हैं। तालाब सूख रहे हैं, कुओं का जलस्तर गिर चुका है और हैंडपंप-ट्यूबवेल जवाब देने लगे हैं। द मूकनायक की ग्राउंड रिपोर्ट में सामने आया है कि जिले के सैकड़ों गांव इस समय भीषण पेयजल संकट से जूझ रहे हैं, जहां पानी सिर्फ जरूरत नहीं, बल्कि रोज की जंग बन चुका है

पानी नहीं है तो खेती कैसे करेंऔर खेती नहीं होगी तो घर कैसे चलेगा?” पन्ना जिले के मकड़ी कुठार गांव के मंधारी आदिवासी की ये बात पूरे बुंदेलखंड के जल संकट की कहानी बयां कर देती है। मंधारी बताते हैं, कभी खेती उनका सहारा हुआ करती थी, लेकिन अब हालात ऐसे हो गए हैं कि बारिश पर निर्भर रहना मजबूरी बन गई है। कई बार तो वे खेत बोने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाते, क्योंकि अगर पानी नहीं गिरा तो पूरी मेहनत बेकार चली जाएगी।

वे कहते हैं कि इस बार 5 एकड़ में गेहूं बोया, लेकिन सिर्फ 10 क्विंटल ही उत्पादन हुआ- इतना कम कि पूरे परिवार का गुजारा भी मुश्किल हो गया। उन्होंने कहाअब तो फसल चौपट हो जाती है, मेहनत का कोई फायदा नहीं मिलता,”

बुंदेलखंड क्षेत्र में हर साल की तरह इस बार, अप्रैल 2026,में भी गर्मी की शुरुआत के साथ ही जल संकट गहराने लगा है। मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में हालात बेहद चिंताजनक होते जा रहे हैं। तालाब सूख रहे हैं, कुओं का जलस्तर गिर चुका है और हैंडपंप-ट्यूबवेल जवाब देने लगे हैं। द मूकनायक की ग्राउंड रिपोर्ट में सामने आया है कि जिले के सैकड़ों गांव इस समय भीषण पेयजल संकट से जूझ रहे हैं, जहां पानी सिर्फ जरूरत नहीं, बल्कि रोज की जंग बन चुका है।

पन्ना जिले के मकड़ी कुठार गांव की तस्वीरें इस संकट की सच्चाई बयां करती हैं। लगभग पंद्रह सौ लोगों के इस गांव में प्रवेश करते ही आदिवासी बस्ती में महिलाएं, बच्चे और पुरुष हाथों में डिब्बे और बर्तन लिए नजर आते हैं। ये सभी लोग बस्ती से लगभग एक किलोमीटर दूर स्थित एकमात्र सक्रिय स्रोत से पानी लाने के लिए रोजाना लंबी दूरी तय करते हैं। गाँव में आधे से ज्यादा लोग मजदूरी के लिए पलायन कर चुके है।

यहां पानी भरना सिर्फ एक काम नहीं, बल्कि पूरे दिन की मेहनत है। सुबह से ही परिवार का हर सदस्य पानी की व्यवस्था में जुट जाता है। छोटे-छोटे बच्चे भी स्कूल जाने की बजाय पानी ढोने में लगे दिखाई देते हैं।

हर दिन संघर्ष, हर बूंद की कीमत

मकड़ी कुठार गांव में हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि पानी की कमी ने लोगों के जीवन के हर पहलू को प्रभावित कर दिया है। यहां पीने के पानी की व्यवस्था करना ही सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। दिन की शुरुआत से लेकर अंत तक परिवार के लोग सिर्फ पानी जुटाने में लगे रहते हैं। ऐसे में न तो समय बचता है और न ही संसाधन, जिसके कारण साफ-सफाई, नहाने-धोने और अन्य जरूरी काम पीछे छूट जाते हैं। कई बार तो लोगों को बेहद सीमित पानी में ही पूरे दिन का गुजारा करना पड़ता है, जिससे स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का खतरा भी बढ़ता जा रहा है।

इस गांव में मुख्य रूप से गोंड जनजाति के लोग निवास करते हैं, जिनकी आजीविका पहले पूरी तरह खेती पर निर्भर थी। लेकिन लगातार घटते जलस्तर और अनिश्चित बारिश ने उनकी इस जीवनशैली को गहरे संकट में डाल दिया है। खेतों में पानी की कमी के कारण फसलें सही तरीके से तैयार नहीं हो पा रहीं, जिससे उत्पादन लगातार घट रहा है। इसका सीधा असर उनकी आमदनी पर पड़ रहा है और अब कई परिवारों को मजबूरी में मजदूरी या पलायन का सहारा लेना पड़ रहा है। पानी की यह कमी अब सिर्फ एक समस्या नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व और भविष्य पर मंडराता हुआ बड़ा संकट बन चुकी है।

5 एकड़ में सिर्फ 10 क्विंटल गेहूं

गांव के निवासी मंधारी आदिवासी की कहानी इस पूरे संकट की गहराई को बयां करती है। उनके परिवार में पांच सदस्य हैं और बीते कई वर्षों से वे लगातार पानी की समस्या से जूझ रहे हैं। मांधारी बताते हैं कि पहले खेती उनके जीवन का आधार हुआ करती थी, लेकिन अब हालात ऐसे हो गए हैं कि पानी के बिना खेती करना लगभग असंभव हो गया है। हर साल आसमान की ओर उम्मीद भरी नजरों से देखते हैं, लेकिन अनिश्चित बारिश उनकी मेहनत पर पानी फेर देती है।

वे कहते हैंअगर अच्छी बारिश हो जाए तभी खेती कर पाते हैं, वरना मजदूरी ही सहारा है। इस साल भी उन्होंने उम्मीद के साथ 5 एकड़ में गेहूं की बुवाई की थी, लेकिन जब फसल तैयार हुई तो केवल 10 क्विंटल ही उत्पादन मिला। इतनी बड़ी जमीन के मुकाबले यह उत्पादन बेहद कम है, जिससे पूरे साल परिवार का गुजारा चलाना मुश्किल हो गया है। मांधारी बताते हैं कि खेती में लागत और मेहनत दोनों बढ़ रही हैं, लेकिन उत्पादन घटता जा रहा है। ऐसे में उन्हें और उनके परिवार को अब मजदूरी पर निर्भर होना पड़ रहा है, ताकि किसी तरह रोजमर्रा की जरूरतें पूरी हो सकें।

सूखे ने तोड़ी उम्मीदें

मांधारी बताते हैं कि साल 2024 उनके लिए पूरी तरह नुकसान का साल रहा। उस वर्ष बारिश इतनी कम हुई कि उन्होंने खेती करने का जोखिम ही नहीं उठाया। उनका कहना है कि जब आसमान से पानी ही नहीं गिरता, तो जमीन पर मेहनत करने का कोई मतलब नहीं रह जाता। लगातार घटती बारिश और तेजी से गिरते जलस्तर ने खेती को पूरी तरह अनिश्चित और जोखिम भरा बना दिया है।

वे बताते हैं कि पहले जहां समय पर बारिश होने से फसल अच्छी हो जाती थी, वहीं अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। अब तो फसल चौपट हो जाती है, मेहनत का कोई फायदा नहीं मिलता,” वे कहते हैं। उनकी आवाज में निराशा साफ झलकती है।

बार-बार लौटता सूखा

पन्ना जिला बुंदेलखंड क्षेत्र का हिस्सा है, जहां सूखा कोई नई या एक बार की समस्या नहीं, बल्कि एक लगातार दोहराने वाली स्थिति बन चुकी है। पिछले दो दशकों में कई ऐसे वर्ष आए हैं जैसे 2002-03, 2012-13, 2015-16 और हाल के 2023-24 जब बारिश सामान्य से काफी कम हुई और पूरे जिले में जल संकट गहराया। इन वर्षों में तालाब सूख गए, कुओं का जलस्तर नीचे चला गया और खेती बुरी तरह प्रभावित हुई। कई बार तो हालात इतने खराब हुए कि किसानों को खेती छोड़ने तक की नौबत आ गई।

दरअसल, पन्ना में समस्या सिर्फ कम बारिश की नहीं, बल्कि बारिश के असमान वितरण और जल प्रबंधन की कमी की भी है। कभी बहुत कम बारिश होती है, तो कभी एक साथ इतनी ज्यादा कि पानी जमीन में समा नहीं पाता। इसके अलावा भूजल का लगातार दोहन, तालाबों और पारंपरिक जल स्रोतों का उपेक्षित होना भी संकट को और गहरा करता है। यही कारण है कि यहां हर 2-3 साल में सूखे जैसे हालात बन जाते हैं और इसका सीधा असर ग्रामीणों, खासकर आदिवासी समुदाय की आजीविका और जीवन पर पड़ता है।

द मूकनायक से बातचीत करते हुए एक बुजुर्ग महिला ने बताया कि गांव में पानी की समस्या इतनी गंभीर हो चुकी है कि पूरा दिन सिर्फ पानी की व्यवस्था करने में ही निकल जाता है। उन्होंने कहा कि परिवार के सभी सदस्य, चाहे महिलाएं हों, पुरुष हों या बच्चे हर कोई सुबह से ही पानी लाने की जद्दोजहद में लग जाता है।

उन्होंने बताया कि सुबह और शाम का पूरा समय सिर्फ पीने के पानी के इंतजाम में ही बीत जाता है। घर के दूसरे काम और बच्चों की पढ़ाई तक प्रभावित हो रही है, क्योंकि प्राथमिकता सिर्फ एक ही है, किसी तरह परिवार के लिए पानी जुटाना।

पलायन की ओर बढ़ते कदम

पानी की कमी और लगातार खराब होती फसल के कारण गांव के कई परिवार अब खेती से पूरी तरह निराश हो चुके हैं और उन्हें मजदूरी पर निर्भर होना पड़ रहा है। मंधारी बताते हैं कि उनका बेटा और परिवार के अन्य सदस्य रोज गांव के आसपास काम की तलाश में भटकते हैं, कभी दिहाड़ी मिल जाती है, तो कभी खाली हाथ लौटना पड़ता है। पहले जहां पूरा परिवार अपने खेतों में मेहनत करता था, अब वही लोग मजदूरी के लिए इधर-उधर भटकने को मजबूर हैं। खेती से मिलने वाली अनिश्चित आमदनी ने उनकी आर्थिक स्थिति को और कमजोर कर दिया है।

यह स्थिति केवल मकड़ी कुठार गांव तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे बुंदेलखंड क्षेत्र की एक बड़ी हकीकत बनती जा रही है। जल संकट ने न सिर्फ खेती को प्रभावित किया है, बल्कि लोगों को अपनी जमीन और पारंपरिक आजीविका से दूर कर दिया है। मजबूरी में कई परिवार गांव छोड़कर शहरों की ओर पलायन करने लगे हैं, जबकि जो लोग गांव में हैं, वे दिहाड़ी मजदूरी के सहारे जीवन काट रहे हैं। इस बदलती तस्वीर में साफ दिखता है कि पानी की कमी अब केवल संसाधन का संकट नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक विस्थापन की बड़ी वजह बन चुकी है।

नल-जल योजना तहत लाइन का काम अधूरा!

गांव में प्रवेश करते ही सबसे पहले नल-जल योजना के तहत बनाई जा रही एक बड़ी पानी की टंकी दिखाई देती है। कागजों पर यह योजना गांव की जल समस्या का स्थायी समाधान मानी जा रही है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है। ग्रामीणों के अनुसार, इस टंकी का निर्माण कार्य पिछले एक साल से अधूरा पड़ा है। टंकी खड़ी है, पाइपलाइन भी गांव में बिछा दी गई है, लेकिन अब तक एक बूंद पानी भी सप्लाई नहीं हो सकी है।

ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों से नल-जल योजना का काम चल रहा है, लेकिन इसकी गति इतनी धीमी है कि लोगों को इसका कोई लाभ नहीं मिल पा रहा। पाइपलाइन बिछने के बावजूद घरों तक पानी पहुंचने की कोई उम्मीद फिलहाल नजर नहीं आती। ऐसे में गांव के लोग आज भी पुराने स्रोतों पर निर्भर हैं और पानी के लिए रोजाना लंबी दूरी तय करने को मजबूर हैं।

द मूकनायक से बातचीत में गांव के उपसरपंच राजू पटेल ने बताया कि मकड़ी कुठार एक जंगल क्षेत्र में स्थित आदिवासी बहुल गांव है, जहां मूलभूत सुविधाओं की भारी कमी है। उन्होंने कहा कि नल-जल योजना के तहत पिछले एक साल से पानी की टंकी का निर्माण कार्य चल रहा है, लेकिन आज तक यह पूरा नहीं हो सका है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि ग्रामीणों को अब तक यह भी स्पष्ट नहीं है कि इस टंकी में पानी कहां से और कैसे लाया जाएगा, क्योंकि गांव ऊंचाई पर बसा हुआ है, जिससे पानी पहुंचाना और भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

राजू पटेल ने बताया कि गांव में करीब 1200 मतदाता हैं और लगभग सभी लोग खेती पर निर्भर हैं। लेकिन पानी की कमी ने उनकी खेती को बुरी तरह प्रभावित किया है, जिसके चलते अब किसान मजदूरी करने को मजबूर हो गए हैं। उन्होंने कहा कि यदि समय रहते जल व्यवस्था को दुरुस्त नहीं किया गया, तो गांव की स्थिति और भी खराब हो सकती है।

द मूकनायक से बातचीत में जय आदिवासी संगठन (जयस) की महिला प्रकोष्ठ अध्यक्ष रामबाई गौंड लक्ष्मी ने बताया कि पन्ना जिले के अधिकांश गांव इस समय भीषण जल संकट से जूझ रहे हैं। उन्होंने कहा, " ऐसी स्थिति में प्रशासन को पानी की वैकल्पिक व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए, लेकिन जमीनी स्तर पर ऐसा कोई प्रभावी प्रयास नजर नहीं आ रहा है।"

उन्होंने आरोप लगाया कि कई गांवों में नल-जल योजना के तहत पाइपलाइन बिछ चुकी है और करीब एक साल पहले इसकी टेस्टिंग भी की जा चुकी है, बावजूद इसके आज तक पानी की सप्लाई शुरू नहीं हो पाई है। रामबाई गौंड ने सरकार पर उदासीनता का आरोप लगाते हुए कहा कि योजनाएं कागजों में पूरी दिखाई जाती हैं, लेकिन उनका लाभ ग्रामीणों तक नहीं पहुंच रहा है।

सैकड़ों गांवों में गहराता संकट

द मूकनायक की टीम द्वारा किए गए दौरे में सामने आया कि पन्ना जिले के सैकड़ों गांवों में जल संकट की स्थिति बेहद गंभीर बनी हुई है। मकड़ी कुठार, अहिरगुवां, अमझिरिया और बगोनहा जैसे गांवों में हालात लगभग एक जैसे हैं, जहां गर्मी शुरू होते ही जल स्रोत तेजी से सूखने लगते हैं। ग्रामीणों के सामने सबसे बड़ी चुनौती पीने के पानी की व्यवस्था करना बन गई है।

इन गांवों में हैंडपंप सूखने की कगार पर हैं, ट्यूबवेल काम नहीं कर रहे और पारंपरिक जल स्रोत जैसे तालाब और कुएं लगभग खत्म हो चुके हैं। नतीजतन, लोगों को दूर-दराज के स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ रहा है, जिससे उनका रोजमर्रा का जीवन और भी कठिन हो गया है। यह स्थिति साफ तौर पर बताती है कि पन्ना में जल संकट अब व्यापक और गहराता हुआ संकट बन चुका है।

पानी नहीं तो भविष्य नहीं

बुंदेलखंड के इन गांवों में जल संकट अब सिर्फ मौसमी समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह एक स्थायी संकट का रूप ले चुका है। पानी की कमी ने लोगों के जीवन, आजीविका और भविष्य तीनों को गहराई से प्रभावित किया है। जब किसी व्यक्ति को पीने का साफ पानी तक उपलब्ध नहीं होता, तो यह सीधे तौर पर उसके सम्मानजनक जीवन जीने के अधिकार पर चोट करता है।

भारतीय संविधान के तहत अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) केवल जीवित रहने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार भी शामिल है। सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में साफ किया है कि स्वच्छ पेयजल तक पहुंच भी इसी अधिकार का हिस्सा है। ऐसे में पन्ना जैसे क्षेत्रों में पानी की लगातार कमी न सिर्फ एक विकास का मुद्दा है, बल्कि यह संवैधानिक अधिकारों के हनन का भी गंभीर सवाल खड़ा करता है।

( सन्दर्भ /साभार -The Mooknayak English)

जल से संबंधित सूचनाओसमाचारों और सन्दर्भों का संकलनपानी -पत्रक

पानी पत्रक- 309 (26 अप्रैल 2026) जलधारा अभियान-जयपुर -संपर्क- उपेन्द्र शंकर-7597088300.मेल-jaldharaabhiyan.jaipur@gmail.com



मंगलवार, 21 अप्रैल 2026

‘अधूरे उपायों का समय समाप्त’: अध्ययन ने अटलांटिक महासागर की जलधारा के भयावह रूप से कमजोर होने की चेतावनी दी

 एक प्रमुख शोधकर्ता ने कहा, “हमें हर कीमत पर इस पतन को रोकना होगा,” और चेतावनी दी कि पूरे ग्रह की स्थिरतादांव पर लगी है।

16 अप्रैल 2026 को प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, वैश्विक जलवायु संकट के कारण अटलांटिक महासागर की एक महत्वपूर्ण जलधारा प्रणाली पहले की भविष्यवाणी से कहीं अधिक तेजी से कमजोर हो रही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि यह रुक जाती है, तो यूरोप, अफ्रीका और अमेरिका के लिए इसके विनाशकारी परिणाम हो सकते हैं।

अटलांटिक मेरिडियनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन [अटलांटिक मेरिडियनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन (AMOC) समुद्री धाराओं का एक विशाल तंत्र है-जो एक वैश्विक 'कन्वेयर बेल्ट' की तरह काम करता है। यह गर्म सतही पानी को उत्तरी अटलांटिक तक पहुँचाता है और ठंडे, गहरे पानी को वापस दक्षिण की ओर भेजता है। जलवायु को नियंत्रित करने, यूरोप के मौसम को हल्का बनाए रखने और कार्बन को सोखने के लिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण है ] वैश्विक जलवायु के नाजुक संतुलन को बनाए रखने के लिए दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण जलधारा प्रणालियों में से एक है। यह गर्म पानी को उत्तर की ओर ले जाकर यूरोप और आर्कटिक जैसे ठंडे क्षेत्रों को सुहावना बनाए रखने में मदद करता है और बड़ी मात्रा में कार्बन को वायुमंडल से बाहर रखते हुए महासागर की गहराई में धकेल देता है।

वैज्ञानिक कुछ समय से AMOC के पतन को लेकर चिंतित हैं। पिछले अध्ययनों से पता चला है कि यह 1,600 वर्षों में अपने सबसे कमजोर बिंदु पर है। लेकिन इस महीने प्रकाशित शोध से पता चलता है कि पतन अनुमान से कहीं अधिक तेजी से हो सकता है।


( इमेज साभार -Pearls and Irritations )

16 अप्रैल 2026 को साइंस एडवांसेज पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन में जलवायु मॉडल और मौजूदा आंकड़ों का उपयोग करते हुए आने वाले दशकों में गिरावट का अनुमान लगाया गया है।

शोधकर्ताओं ने पाया कि यह प्रणाली सदी के अंत तक 50% से अधिक धीमी हो जाएगी और सदी के मध्य तक एक महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंच सकती है, जिसके बाद इसकी गिरावट अपरिवर्तनीय हो जाएगी।

 बोर्डो साउथ-वेस्ट के इनरिया रिसर्च सेंटर के प्रमुख शोधकर्ता वैलेंटीन पोर्टमैन ने कहा, "हमने पाया कि अटलांटिक मेरिडियनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन ( एएमओसी) सभी जलवायु मॉडलों के औसत अनुमान से कहीं अधिक तेजी से घट रहा है। इसका मतलब है कि हम पहले की तुलना में एक महत्वपूर्ण मोड़ के करीब हैं।"

इसकी धीमी गति का एक प्रमुख कारण ग्रीनलैंड की मीठे पानी की बर्फ की चादर का अटलांटिक में तेजी से पिघलना है, जिससे सघन खारा पानी पतला हो गया है और उत्तर की ओर इसका स्थानांतरण कठिन हो गया है।

उन्होंने समझाया: "ग्रीनलैंड जितनी तेजी से पिघलता है, उतना ही अधिक मीठा पानी उत्तरी अटलांटिक में भर जाता है। यह स्थानांतरण या प्रवेश की प्रक्रिया को बाधित करता है, जिससे प्रभावी रूप से पूरी प्रणाली पर ब्रेक लग जाता है।"

यह शोध मियामी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा पिछले सप्ताह प्रकाशित एक  अध्ययन के बाद आया है, जिसमें पाया गया कि अटलांटिक महासागर में चार अक्षांशों पर AMOC कमजोर हो रहा है।

 पॉट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इंपैक्ट रिसर्च के एक प्रमुख AMOC शोधकर्ता, प्रोफेसर स्टीफ़न रहमस्टॉर्फ़जो इन दोनों में से किसी भी अध्ययन में शामिल नहीं थेने इसे "एक महत्वपूर्ण और बेहद चिंताजनक नतीजा" बताया, जो इस बात की "पुष्टि करता है कि 'निराशावादी' जलवायु मॉडलयानी वे मॉडल जो 2100 तक AMOC के गंभीर रूप से कमज़ोर पड़ने का अनुमान लगाते हैंही सबसे सटीक हैं।"

रहमस्टॉर्फ़ ने समझाया, "पृथ्वी के इतिहास के पिछले 100,000 वर्षों में हमने जलवायु में जो सबसे नाटकीय और ज़बरदस्त बदलाव देखे हैं, वे तब हुए हैं जब AMOC एक अलग स्थिति में चला गया।"

मौजूदा सिस्टम के बंद हो जाने से एक ऐसा खतरा पैदा होता है, जिसे कनाडाई जलवायु कार्यकर्ता और समुद्री संरक्षणवादी पॉल वॉटसन ने "जलवायु संबंधी उथल-पुथल का एक “डोमिनो इफ़ेक्ट" (जलवायु संबंधी उथल-पुथल के 'डोमिनो प्रभाव' का तात्पर्य एक ऐसी क्रमिक और स्वतः-पुष्टिकारक शृंखला प्रतिक्रिया से है, जिसमें किसी एक पर्यावरणीय 'टिपिंग पॉइंट' (संवेदनशील सीमा) का उल्लंघन अन्य सीमाओं को भी सक्रिय कर देता है, जिससे पृथ्वी के 'हॉटहाउस' (अत्यधिक गर्म) अवस्था में पहुँचने की संभावना बन जाती है ) बताया है।

 वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया है कि उत्तरी यूरोप में तापमान तेज़ी से गिर सकता है; लंदन में सर्दियाँ कभी-कभी -20°C (-4°F) से भी नीचे पहुँच सकती हैं, और नॉर्वे में तापमान -48°C (-54°F) तक जा सकता है। इससे फसलों के उगने का मौसम भी नाटकीय रूप से छोटा होने का खतरा है, जिससे करोड़ों लोगों की खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।

उत्तरी अटलांटिक में आने वाले उष्णकटिबंधीय तूफ़ान भी और ज़्यादा गंभीर हो जाएँगे। जैसे-जैसे समुद्री धारा धीमी होगी, समुद्र का जलस्तर बढ़ने की उम्मीद है; साथ ही, ठंडे होते यूरोप और गर्म होते उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के बीच तापमान का बढ़ता अंतर और भी ज़्यादा ज़ोरदार तूफ़ानों को बढ़ावा दे सकता है, और बड़े तटीय शहरों में बाढ़ का खतरा बढ़ा सकता है।

रहमस्टॉर्फ़ ने कहा, "हमें हर कीमत पर इस पतन को रोकना होगा।" "दाँव बहुत ऊँचे हैं; यह सिर्फ़ यूरोप की जलवायु का मामला नहीं है, बल्कि पूरे ग्रह की स्थिरता का मामला है।"

वैश्विक गर्मी के प्रवाह में इस तरह के नाटकीय बदलाव से दुनिया भर में तापमान और बारिश के पैटर्न पूरी तरह से गड़बड़ा सकते हैं; इससे कुछ क्षेत्रों में सूखे का खतरा बढ़ सकता है, और मॉनसून का मौसम बाधित हो सकता है-जिस पर कई क्षेत्रों में खेती-बाड़ी निर्भर करती है।

इसके अलावा, यह स्थिति खुद को दोहराने वाला एक चक्र भी बन सकती है, क्योंकि समुद्र से निकलने वाली भारी मात्रा में कार्बन AMOC के पतन की प्रक्रिया को और भी तेज़ कर सकती है। पिछले हफ़्ते प्रकाशित एक शोध में पाया गया कि अकेले दक्षिणी महासागर से होने वाले कार्बन उत्सर्जन से वैश्विक तापमान में लगभग 0.2°C की वृद्धि हो सकती है।

वॉटसन ने कहा, "विज्ञान बिल्कुल साफ़ है: AMOC पतन के कगार पर खड़ा है, और कार्रवाई करने का समय तेज़ी से निकलता जा रहा है।" "फिर भी, दुनिया भर के नेता छोटी-मोटी राजनीति और सच्चाई से मुँह मोड़ने की मानसिकता में फँसकर बेबस बने हुए हैं।" संयुक्त राष्ट्र के हालिया जलवायु शिखर सम्मेलन, COP30 के नतीजों को, बढ़ते जलवायु संकट से निपटने के लिए बेहद अपर्याप्त बताया गया है। मेज़बान देश ब्राज़ील द्वारा जारी की गई कार्ययोजना में "फ़ॉसिल फ़्यूल" (जीवाश्म ईंधन) शब्द का कोई ज़िक्र नहीं था, क्योंकि इस सम्मेलन पर उद्योग जगत के लॉबिस्ट हावी हो गए थे।

"अब आधे-अधूरे उपायों का समय खत्म हो चुका है," वॉटसन ने कहा। "अगले दस सालों में हम जो फ़ैसले लेंगे, उनसे ही यह तय होगा कि आने वाली पीढ़ियों को एक ऐसा जलवायु मिलेगा जिसे संभाला जा सके, या फिर एक ऐसा संसार जो पूरी तरह से अफ़रा-तफ़री में डूबा हो।"

(सन्दर्भ /साभार – Commons Dreams में Stephen Prager के लेख का अनुवाद , The Gaurdian)

जल से संबंधित सूचनाओसमाचारों और सन्दर्भों का संकलनपानी -पत्रक

पानी पत्रक- 308 (22 अप्रैल 2026) जलधारा अभियान-जयपुर -संपर्क- उपेन्द्र शंकर-7597088300.मेल-jaldharaabhiyan.jaipur@gmail.com



 

 

 

 

पन्ना के सैकड़ों गांवों में गहराया जल संकट- पानी की व्यवस्था करना सबसे बड़ी चुनौती

  बुंदेलखंड क्षेत्र में हर साल की तरह इस बार ( यानि अप्रैल 2026 ) भी गर्मी की शुरुआत के साथ ही जल संकट गहराने लगा है। मध्य प्रदेश के पन्ना ...