मंगलवार, 20 जनवरी 2026

ओरण- गोचर बचाने के लिये पश्चिमी राजस्थान के ग्रामीणों की 722 किलोमीटर की पैदल यात्रा

 
                                                                     

  ( जैसलमेर में सांवता गांव के पास ओरण-फोटो पार्थ जगानी द्वारा-इमेज साभार -MONGABAY)

यह धरती सिर्फ़ रेत नहीं
यह जैसलमेर की आत्मा है।
ओरण, गोचर, तालाब, कुएँ, बावड़ियाँ, खडीन, आगोर
यही हमारी गायों का सहारा हैं,
यही हमारी पीढ़ियों की पहचान हैं।
लेकिन आज
सोलर, विंड, सीमेंट और खनन कंपनियाँ
हमारे जल, जंगल, जीव-जंतुओं
और स्थानीय जीवन को निगल रही हैं।
अब चुप रहने का समय नहीं है।
श्री तनोट माता मंदिर, जैसलमेर से
विधानसभा भवन, जयपुर तक
निकलेगी ओरण बचाओ पद यात्रा।
मांग साफ़ है
ओरण, गोचर, नदी-नाले, मंदिर, छतरियाँ,
आम रास्ते और धाणियाँ
राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज हों।
यह लड़ाई सिर्फ़ जैसलमेर की नहीं,
यह लड़ाई आने वाली पीढ़ियों की है।
आइए
संघर्ष करें,
जयपुर चलें,
जैसाण के लिए लड़ें ओरण बचाएँ।
टीम ओरण जैसलमेर

 पश्चिमी राजस्थान, भारत का वह अभागा क्षेत्र है जिसे भारत के अधिकांश लोग एक सूखा रेतीला मरुस्थल समझते हैँ, जहाँ दूर दूर तक बस बंजर जमीन है और कुछ नहीं। लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है, हाँ,यह इलाका मरुस्थल है लेकिन दुनिया के सभी मरुस्थलों में सबसे अधिक हरा भरा, जहाँ 250 से अधिक किस्म के पेड़ पौधे वनस्पतियाँ पनपती हैँ, जिनमें से काफी किस्में भारत में कहीं और नहीं पाई जाती केवल यहीं मिलती हैँ। इसी प्रकार यहाँ विश्व के अन्य मरुस्थलों से अधिक, तकरीबन 300 से अधिक कीट पतंगो, पक्षीयों इत्यादि जीव जंतुओं की प्रजातियाँ भी हैँ और यह दुनिया का सर्वाधिक जनसंख्या वाला मरुस्थल भी है, भले ही भारतीय जनसंख्या मानको में यह सबसे कम आबादी वाले क्षेत्रों में से एक हो! यह सब सम्भव हुआ क्योंकि यहाँ  संसार के सभी मरुस्थलो से ज्यादा वर्षा भी होती है। आम प्रचलित धारणा के विपरीत यह क्षेत्र विश्व के सभी मरुस्थलों में सबसे कम रेतीला भी है, इसका अधिकांश क्षेत्र प्राचीन भूगर्भीय हलचलो से बना चट्टानी-पठारी क्षेत्र है जो उबड़ खाबड़, पथरीला और कहीं कहीं छोटी पहाड़ियों वाला है। इन्ही पठारो - पहाड़ियों की ढालो से यहाँ बरसाती नदियों, नालों का निर्माण होता है, जैसलमेर जिले में आज भी अनेक नदी नाले बरसात के दिनों में लम्बी दूरी तक बहते हैँ, यहाँ की गोगड़ी नदी 50-75 किलोमीटर तो काक नदी 100 किलोमीटर से अधिक तक का सफर जिले में ही तय कर लेती है। केवल नदी नाले ही नहीं यहाँ पानी की बड़ी बड़ी लेकिन कम गहरी झीलें भी हैँ जो अच्छी बरसात में भर जाती हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में रण/रिण बोला जाता है। इन्ही नदियों व झीलों के कारण यहाँ पर इंसानी सभ्यता का विकास पाषाण काल से ही प्रारम्भ हो चुका था, जिसके साक्ष्य इस मरुस्थल के हृदय माने जाने वाले जैसलमेर जिले के विभिन्न स्थानों पर प्राप्त हो चुके हैँ, पिछले वर्ष ही यहाँ चार हजार वर्ष प्राचीन हड़प्पा सभ्यता के एक नगर के अवशेष भी खोजे गये हैँ और तकरीबन दो हजार वर्ष पुरानी बसावटो के अवशेष भी इतिहास-पुरातत्व शोधकर्ताओ को प्राप्त हो चुके हैँ। एक हजार वर्षों से अधिक पुराना यहाँ का इतिहास लिखित रूप में भी विभिन्न लेखकों द्वारा राजस्थानी भाषा में रचित ऐतिहासिक स्रोतो में उपलब्ध है और 870 वर्षो का जैसलमेर दुर्ग हम सभी के सामने आज भी पूरी दृढ़ता के साथ खड़ा हुआ मौजूद है। इस रेगिस्तान में यह सब कैसे सम्भव हुआ? क्योंकि यहाँ के लोगों ने इस रेगिस्तान को जीतने, हराभरा बनाने की कोशिश नहीं की बल्कि उसके अनुरूप खुद को ढाल लिया था, अपने आसपास मौजूद सिमित प्राकृतिक संसाधनों को भी सहेज कर रखना, पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये बगैर उनका अधिकतम उपयोग करने का न केवल ज्ञान अपितु संस्कृति ही विकसित कर डाली थी। उसी का नतीजा है की जैसलमेर जिले में आज भी प्रत्येक गाँव के पास पुराने बेर, खेजड़ी, कुम्भट, रोहिड़े, जाळ के  वृक्षों से भरपूर, विभिन्न किस्मो की घास के चारागाहो से युक्त पुराने संरक्षित वन क्षेत्र मौजूद हैँ, जिन्हें स्थानीय भाषा में ओरण कहा जाता है। इन्ही ओरणों में से या उनके आसपास से बरसाती नदी नालो का भी उदगम होता है जिनके प्रवाह में हजारों वर्षों पुराने छोटे बांध बनाकर तालाबों व खेती के लिये खडीनो का निर्माण किया गया था। खडीन यहाँ के निवासियों द्वारा विकसित सबसे अनूठी कृषि तकनीक है जो आज भी पूर्णतः बरसातो पर आधारित है। इन्ही के कारण जैसलमेर की जनता हजारों वर्षों से देश में सर्वाधिक पशुधन पालने वाली जनता है, जिसका रोजगार भी इसी पर आधारित है, यहाँ की थारपारकर-काँकरेज जैसी गाय की नस्लें, मारवाड़ी भेड़, जैसलमेरी बकरी, जैसलमेरी ऊँट आज भी यहाँ के हजारों सालों से चले आ रहे पशुपालन की पूरी दुनिया को भेंट है। आज भी यहाँ देश के सर्वाधिक पशुपालक रहते हैँ और यहाँ सर्वाधिक पशुधन मौजूद है, जो यहाँ के घास मैदानों व ओरणों से ही चारा प्राप्त करते हैँ। पहले इन सब व्यवस्थाओ की देख रेख यहाँ का समाज स्वयं करता था, लेकिन 1947 में भारत की स्वतंत्रता और उसके बाद जैसलमेर रियासत के भारत में विलय के साथ ही यह सामाजिक व्यवस्था नष्ट हो गई! 

 

सुदूर क्षेत्र होने, परिवहन के आधुनिक संसाधनों की कमी, आधुनिक शिक्षा व लोकतंत्र प्रशासनिक व्यवस्था की समझ न होने से जैसलमेर के अधिकांश ग्रामीण अपने आसपास मौजूद इन प्राकृतिक पठारो, पहाड़ियों, नदी, नालो, पूर्वजों द्वारा संरक्षित ओरण वन क्षेत्रों -चारागाहो और उन्हीं पूर्वजों द्वारा बनवाये तालाबों, उनके कैचमेंट में बने कुँओं व खड़ीनो को सरकारी प्रशासनिक राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज करवाकर सुरक्षित नहीं करवा सके। आजादी के बाद से ही इस पूरे क्षेत्र को  सरकारी प्रशासनिक राजस्व दस्तावेजो में बंजड़ बताकर सरकारी जमीन बताया जाता रहा है और आज उसी का खामियाजा यहाँ की जनता उठाने को विवश है। यहाँ के पशुपालको के लिये कीमती घास मैदानों का बड़ा हिस्सा पहले ही इंदिरा गाँधी नहर परियोजना के कारण खेती में तब्दील हो चुका है, बाकी बचे चारागाह, ओरण व कुछ खडीन भी सरकारी जमीन होने से पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न ऊर्जा कम्पनियो, खनन कम्पनियो, सीमेंट कम्पनियो को आवंटित होने लगे हैँ जिस कारण यहाँ के ग्रामीणों की न केवल आर्थिक गतिविधियों अपितु सांस्कृतिक ऐतिहासिक विरासतों, पेयजल स्रोतो पर भी संकट मंडराने लगा है।

 यहाँ के वाशिंदे पिछले लम्बे समय से अपने चारागाहो, ओरणों, पठारो, नदी, नालों, उनके कैचमेंट, खड़ीनो, तालाबों, कुँओं को राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज कर सुरक्षित रखने की मांग कर रहे हैँ, जिस कारण वर्ष 1998 में सम्पूर्ण भादरिया ओरण, वर्ष 2002 में देगराय ओरण का कुछ क्षेत्र और वर्ष 2023 में पुनः देगराय ओरण के कुछ शेष रहे क्षेत्र सहित दस अन्य ओरण सरकारों ने दर्ज किये, लेकिन आज भी अनेको ओरण इत्यादि जैसलमेर में दर्ज होने बाकी हैँ।

 इसी विषय को लेकर जैसलमेर के साथ राज्य व केंद्र सरकारों द्वारा किये जा रहे सौतेले व्यवहार से क्षुब्ध पश्चिमी राजस्थान के विभिन्न गाँवों के लोग समय समय पर जैसलमेर जिला मुख्यालय पर धरना, गाँवों की ओरणों की पैदल परिक्रमा, ओरण आरती, गाँवों से जिला कलेक्ट्रेट तक पैदल यात्राएँ पिछले 6 वर्षों से लगातार करते आ रहे हैँ, वहाँ के युवा अपनी विभिन्न यात्राओं, ओरण परिक्रमाओ के माध्यम से अभी तक हजारों किलोमीटर पैदल चल चुके हैँ, वर्ष 2024 में बईया गाँव में और वर्ष 2025 में जैसलमेर जिला कलेक्टर के समक्ष एक-एक महीने से अधिक के धरने दे चुके हैँ। वर्ष 2025 के इसी एक महीने से अधिक चले धरने को जिला कलेक्टर, जैसलमेर विधायक, पोकरण विधायक व स्थानीय नेताओं ने अक्टूबर में आम सहमती व आश्वासन देकर समाप्त करवाया था की जिले के समस्त ओरण, पठार, नदी, नालेखडीन, कुँओं, उनके कैचमेंट और उनमें मौजूद प्राकर्तिक एतिहासिक विरासतों को राजस्व रिकॉर्ड में इंद्राज करवाकर सुरक्षित करवा लिया जायेगा और इस प्रकार की भूमियों को विभिन्न कम्पनियो को आवंटित नहीं किया जायेगा, परन्तु 19 जनवरी 2026 को वह तीन महीनो का समय समाप्त हो चुका है और नतीजा शून्य रहा है।

अपने इसी रोष व स्थानीय नेताओं, शासन, प्रशासन की वादा खिलाफ़ी के विरोध में जैसलमेर जिले के ग्रामीण 21 जनवरी से सीमावर्ती गाँव तनोट के विख्यात तनोट माता मंदिर से पैदल यात्रा प्रारम्भ कर 722 किलोमीटर का सफर तय कर 21 फरवरी को जयपुर विधानसभा तक पहुंचेंगे।

                                                                                   ( सन्दर्भ / साभार -पार्थ जगाणी,टीम ओरण -जैसलमेर से )

धरती पानी  से संबंधित सूचनाओसमाचारों और सन्दर्भों का संकलनपानी पत्रक   पानी पत्रक- 282( 21 जनवरी 2026 ) जलधारा अभियान,221,पत्रकार कॉलोनी,जयपुर-राजस्थान,302020,संपर्क उपेन्द्र शंकर-7597088300.मेल-jaldharaabhiyan.jaipur@gmail.com

 

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