रविवार, 28 दिसंबर 2025

इथेनॉल ईंधन पर सरकार के दावों से अलग,विशेषज्ञों की धरती पानी संकट की चेतावनी

लोकसभा में केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री ने ई20 ईंधन को पर्यावरण और अर्थव्यवस्था के लिए सुरक्षित बताया, लेकिन विशेषज्ञों ने इंजन क्षति, माइलेज गिरावट, भूमि-जल संकट और खाद्य सुरक्षा पर गंभीर सवाल उठाए

इथेनॉल-मिश्रित (ई20) ईंधन से जुड़ी बहसें तब और उलझ गईं जब राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले के टीब्बी इलाके में एक निर्माणाधीन इथेनॉल संयंत्र, के खिलाफ किसानों के विरोध ने  हिंसक रूप ले लिया. 10-11 दिसंबर को सैकड़ों किसान राठी खेड़ा गांव में निर्माणाधीन ड्यून इथेनॉल प्राइवेट लिमिटेड संयंत्र की दीवार तोड़ने के लिए ट्रैक्टर लेकर पहुंच गए थे.प्रदर्शनकारियों ने पुलिस बैरिकेड तोड़ दिए कुछ गाड़ियां जलाई गईं और पुलिस ने लाठीचार्ज करते हुए आंसू गैस का इस्तेमाल किया. प्रशासन ने इंटरनेट और स्कूलदुकानों पर प्रतिबंध लगा दिया. किसानों  के अनुसार किसानों का यह आंदोलन स्थानीय स्वीकृति के बिना फैसले का परिणाम है.450 करोड़ बाली इस फैक्ट्री को 12 दिसबर 2025 को प्रसाशन दुआरा लिये गये निर्णय से  रोक दिया गया .

11 दिसंबर 2025 को ही लोकसभा में केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री ने बताया कि 20% इथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल (ई20) पर्यावरण तथा अर्थव्यवस्था के लिए लाभदायक है.उन्होंने बताया कि  ईंधन के ई20 मिश्रण ने भारत में पहले ही कार्बन उत्सर्जन में करीब 736 लाख मीट्रिक टन की कमी ला दी  साथ ही सरकारी आंकड़ों के अनुसार अप्रैल 2014 से अब तक ई20 के प्रयोग से करीब 1.40 लाख करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बची है .मंत्रालय के मुताबिक  इसके इस्तेमाल से ,न तो प्रदर्शन में कोई गिरावट देखी गई और न ही इंजन को क्षति हुई; 20 ने हॉट/कोल्ड स्टार्ट परीक्षण भी बिना समस्या के पास किए. इसलिए पुरानी गाड़ियों को हटाने या बदलने की आवश्यकता नहीं है.

यंहा यह भी जान लें कि ई20 पेट्रोल वह ईंधन है जिसमें 20% इथेनॉल और 80% पारंपरिक पेट्रोल का मिश्रण होता है. भारत सरकार इसे चरणबद्ध तरीके से पूरे देश में लागू कर रही है ताकि कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम हो, किसानों को अतिरिक्त आय मिले और कार्बन उत्सर्जन भी घटे.

पर्यावरण और कृषि वैज्ञानिकों की राय भी मिलीजुली है.

प्रमुख शोध परिणाम बताते हैं कि ई20 उपयोग से जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम होती है और कार्बन उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी आती है. हालांकि, शोधकर्ता आगाह करते हैं कि फायदों के साथ कुछ गंभीर नुकसान भी है. भारत में ई20 इथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल की स्थिरता पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला एक महत्वपूर्ण शोध पत्र दिसंबर 2025 में साइंस डायरेक्ट (Are ethanol-gasoline blends sustainable in India? A life cycle perspective on benefits and trade-offs -Chaitanya Kaduba Harde and Deepak Kumar Ojha)पर प्रकाशित हुआ है. यह सरकार के हरित ईंधन क्रांतिके दावों के ठीक उलट एक चिंताजनक तस्वीर सामने रखता है.

शोध के अनुसार, 20 ईंधन का सबसे बड़ा पर्यावरणीय दबाव भूमि और जल के अत्यधिक उपयोग से जुड़ा है. इथेनॉल उत्पादन का मुख्य स्रोत गन्ना है और गन्ना खेती अपने आप में भारी पर्यावरणीय लागत के लिए बदनाम है.

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि एक लीटर इथेनॉल बनाने के लिए औसतन 2,860 लीटर पानी की जरूरत होती है और यह केवल सिंचाई के लिए आवश्यक पानी है. भारत के अधिकांश जिले पहले से ही पानी की कमी झेल रहे हैं. ऐसे में ई20 लक्ष्य हासिल करने की दिशा में बढ़ना जल संकट को कई गुना बढ़ा सकता है.

शोधपत्र का अनुमान है कि यदि भारत अपने ई20 लक्ष्य पूरे कर लेता है, तो देश की वार्षिक सिंचाई जल मांग में 50 अरब घनमीटर की अतिरिक्त वृद्धि होगी. यह पानी दिल्ली की 17 साल की कुल आवश्यक पानी की आपूर्ति के बराबर है.

इसी तरह, केवल मक्का की खेती के लिए अतिरिक्त 80 लाख हेक्टेयर भूमि की जरूरत पड़ेगी, जो भारत की कुल कृषि भूमि का लगभग एक चौथाई है. लेकिन समस्या केवल जल और भूमि तक सीमित नहीं है. शोध में यह भी पाया गया है कि: गन्ना खेती के कारण वन क्षेत्र घट रहे हैं, जंगलों और चरागाहों का रूपांतर कृषि भूमि में हो रहा है, जैवविविधता कम हो रही है, मिट्टी की उर्वरता और उसकी प्राकृतिक संरचना तेजी से नष्ट हो रही है.

इथेनॉल उत्पादन प्रक्रिया के कारण अम्लीयता भी बढ़ती है, जिससे अम्ल वर्षा जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं और मिट्टी तथा जलाशयों का अम्लीकरण बढ़ता है.

खाद्य-सुरक्षा पर भी खतरा

जब गन्ना व मक्का जैसी फसलें ईंधन उत्पादन में लगने लगती हैं, तो खाद्य फसलों का हिस्सा घटता है और कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका बढ़ जाती है. यदि अनाज आधारित फसलें भी इथेनॉल उत्पादन में बड़े पैमाने पर लगें, तो खाद्यमुद्रास्फीति का खतरा और गंभीर हो सकता है.

यह शोध एक कड़ा संकेत है कि सरकार जिन दावों के साथ ई20 को हरित विकल्पके रूप में पेश कर रही है, उनके पीछे भारीभरकम और दीर्घकालिक पर्यावरणीय लागत छिपी हुई है.

यह लागत आने वाले दशकों में भारत की: जलसुरक्षा, कृषि विविधता, और पर्यावरणीय संतुलन को गहरे तौर पर प्रभावित कर सकती है. खुद नीति आयोग ने स्वीकार किया है कि इतने बड़े बायोफ्यूल लक्ष्यों को तभी आगे बढ़ाया जाना चाहिए, जब ऐसी उन्नत तकनीकें उपलब्ध हों, जो भूमि और जल की खपत को कई गुना कम कर दें. लेकिन वास्तविकता यह है कि ऐसी कोई व्यावहारिक तकनीक अभी मौजूद नहीं है.

(सन्दर्भ / साभार – द वायर-हिंदी;इमेज -फेसबुक पेज मौसम केंद्र गंगानगर हनुमानगढ़ )

धरती पानी  से संबंधित सूचनाओसमाचारों और सन्दर्भों का संकलनपानी पत्रक   पानी पत्रक- 274( 28 दिसम्बर 2025 ) जलधारा अभियान,221,पत्रकार कॉलोनी,जयपुर-राजस्थान,302020,संपर्क उपेन्द्र शंकर-7597088300.मेल-jaldharaabhiyan.jaipur@gmail.com



  



सोमवार, 22 दिसंबर 2025

अरावली की सुप्रीम कोर्ट की नई परिभाषा,भारत की सबसे पुरानी पहाड़ी श्रृंखला के परिदृश्य को कैसे बदलती है

 सुप्रीम कोर्ट द्वारा अरावली के लिए ऊंचाई-आधारित परिभाषा अपनाने से नियामक एकरूपता आ सकती है, लेकिन यह भारत के सबसे नाजुक पारिस्थितिक तंत्रों में से एक के लिए पर्यावरण संरक्षण को कमजोर करता है।

पिछले महीने, सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों और श्रृंखलाओं की परिभाषा से संबंधित मुद्दे (2025) में केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ('MoEFCC') के नेतृत्व वाली एक समिति द्वारा अनुशंसित परिभाषा को स्वीकार कर लिया। कोर्ट ने कहा कि केवल वे भू-आकृतियाँ जो लोकल रिलीफ से कम से कम 100 मीटर ऊपर उठती हैं, उन्हें अरावली पहाड़ियों के रूप में योग्य माना जाएगा, और ऐसी पहाड़ियों के समूह जो एक-दूसरे से 500 मीटर के भीतर स्थित हैं, वे अरावली श्रृंखला का निर्माण करेंगे। भारतीय वन सर्वेक्षण ने बताया है कि कई राज्यों में मैप की गई 12,081 पहाड़ियों में से केवल 1,048 (8.7 प्रतिशत) ही 100 मीटर के मानदंड को पूरा करती हैं। इससे कई विशेषज्ञ चिंतित हैं।

दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, और गुजरात में फैली, दक्षिण-पश्चिम दिशा में लगभग 670 किमी चलती, अरावली एक जीवित पारिस्थितिक बुनियादी ढांचा है और भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे पुरानी पहाड़ी श्रृंखला है। यह श्रृंखला, जिसकी उम्र लगभग 1.7 बिलियन  वर्ष अनुमानित है, थार रेगिस्तान के प्रसार को धीमा करने में एक प्राकृतिक बाधा के रूप में कार्य करती है, सूक्ष्म-जलवायु को स्थिर करने और जलभृतों को रिचार्ज करने के महत्वपूर्ण कार्य भी करती  है। इसी पर्वत श्रृंखला से बहुत सी नदियाँ , नाले निकलते हैं, बहुत सी झीलें इसी पर्वत माला के पहाड़ों में हैं .

 लेकिन अरावली श्रृंखला का लगभग 90% हिस्सा अब कानूनी सुरक्षा के लिए योग्य नहीं होगा, यह परिभाषा निचले इलाकों की झाड़ीदार पहाड़ियों, घास के मैदानों और लकीरों को बाहर कर सकती है जो अरावली प्रणाली का अधिकांश हिस्सा बनाते हैं। यह प्रभावी रूप से दशकों की कानूनी सुरक्षा को खत्म कर देती है।  जिससे बड़े पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र खनन और वाणिज्यिक शोषण के लिए प्रभावी रूप से खुल जाएंगे। यह फैसला भारत के पर्यावरण शासन में एक मौलिक बदलाव को भी दर्शाता है - पारिस्थितिक महत्व पर तकनीकी परिभाषाओं को प्राथमिकता देना, जो कि खनन या जमीन का किसी अन्य कमर्शियल उपयोग के लिये  आसानी से काम में ली जा संके . 

 अरावली की परिभाषा कोर्ट के लिए एक सवाल क्यों बन गई

सुप्रीम कोर्ट लंबे समय से चल रहे, दो पर्यावरणीय मामलों के माध्यम से अरावली श्रृंखला में खनन के मुद्दे पर विचार कर रहा था (1) एम.सी. मेहता बनाम भारत संघराज्य  (1985), जिसके जनादेश के तहत कोर्ट हरियाणा में अरावली में खनन गतिविधियों की निगरानी कर रहा था, और (२) टी.एन. गोदावर्मन थिरुमलपाद बनाम भारत संघराज्य  (1995), जिसके जनादेश के तहत कोर्ट राजस्थान में अरावली में खनन गतिविधियों की निगरानी कर रहा था। जनवरी 2024 में बाद वाले मामले की सुनवाई के दौरान, यह सवाल उठा कि क्या कुछ खनन कार्य अरावली पहाड़ियों के भीतर आते हैं या उनसे बाहर। अलग-अलग राज्यों ने अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं को लेकर अलग-अलग परिभाषाएँ इस्तेमाल कीं, और कुछ मामलों में, जैसे कि हरियाणा में, कोई आधिकारिक परिभाषा थी ही नहीं।

इससे एक साफ़ और लगातार सीमांकन ( परिभाषा ) की ज़रूरत बढ़ गई, जो माइनिंग को रेगुलेट करने और पर्यावरण की रक्षा के लिए बहुत ज़रूरी है। साफ़ परिभाषा न होने के कारण यह अनिश्चितता थी कि माइनिंग कानूनी तौर पर कहाँ हो सकती है, जिससे पर्यावरण सुरक्षा उपायों को लागू करना और भी मुश्किल हो गया और अवैध माइनिंग गतिविधियों को बढ़ावा मिला। इस समस्या को हल करने के लिए, मई, 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने एक समान परिभाषा को अंतिम रूप देने के लिए MoEF&CC, राज्य वन विभागों, भारतीय वन सर्वेक्षण ('FSI'), केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति और भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण सहित एक बहु-एजेंसी समिति के गठन का निर्देश दिया।

समिति ने इस साल, अक्टूबर 2025, में अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसके आधार पर जजमेंट में अरावली पहाड़ियों और पर्वतमाला इस तरह परिभाषित है :-

 अरावली पहाड़ियाँ: अरावली ज़िलों में स्थित कोई भी भू-आकृति, जिसकी ऊँचाई लोकल रिलीफ से 100 मीटर या उससे ज़्यादा हो, उसे अरावली पहाड़ियाँ कहा जाएगा। इस उद्देश्य के लिए, लोकल रिलीफ को  (जजमेंट के पैरा-5.1.1 के अनुसार ), भू-आकृति को घेरने वाली सबसे निचली कंटूर रेखा के संदर्भ में निर्धारित किया जाएगा। ऐसी सबसे निचली कंटूर रेखा से घिरे क्षेत्र के भीतर स्थित पूरी भू-आकृति, चाहे वह वास्तविक हो या काल्पनिक रूप से बढ़ाई गई हो, साथ ही पहाड़ी, उसके सहायक ढलान और संबंधित भू-आकृतियाँ, चाहे उनका ढलान कुछ भी हो, उन्हें अरावली पहाड़ियों का हिस्सा माना जाएगा।

अरावली पर्वतमाला: जजमेंट के पैरा-5.1.2 में परिभाषित के अनुसार,दो या दो से अधिक अरावली पहाड़ियाँ, जो एक-दूसरे से 500 मीटर की दूरी पर स्थित हों, जिसे दोनों तरफ सबसे निचली कंटूर रेखा की सीमा पर सबसे बाहरी बिंदु से मापा जायेगा ,अरावली पर्वतमाला बनायगी। दो अरावली पहाड़ियों के बीच का क्षेत्र दोनों पहाड़ियों की सबसे निचली कंटूर रेखाओं के बीच की न्यूनतम दूरी के बराबर चौड़ाई को बफ़र बनाकर निर्धारित किया जायगा । फिर दोनों बफ़र बहुभुजों के प्रतिच्छेदन को जोड़कर दोनों बफ़र बहुभुजों के बीच एक प्रतिच्छेदन रेखा उत्पन्न की जायगी । अंत में, प्रतिच्छेदन रेखा के दोनों अंतिम बिंदुओं से दो रेखाएँ लंबवत खींची जाएँगी , और तब तक बढ़ाई जाएँगी जब तक वे दोनों पहाड़ियों की सबसे निचली कंटूर रेखा को प्रतिच्छेद न करें। जैसा कि बताया गया है, इन पहाड़ियों की सबसे निचली कंटूर रेखाओं के बीच आने वाली भू-आकृतियों का पूरा क्षेत्र, साथ ही संबंधित विशेषताएँ जैसे पहाड़ियाँ, टीले, सहायक ढलान, आदि, को भी अरावली पर्वतमाला के हिस्से के रूप में शामिल किया जाएगा।

हालांकि, वरिष्ठ वकील के. परमेश्वर, जो एमिकस क्यूरी थे, ने नई परिभाषा का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि इससे पहले ( अगस्त 2010) के FSI परिभाषा ((i) ढलान >, (ii) तलहटी बफर = 100m, (iii) पहाड़ियों के बीच की दूरी या घाटी की चौड़ाई = 500m और (iv) ऊपर बताई गई पहाड़ियों से चारों तरफ से घिरा हुआ क्षेत्र।) अरावली की पारिस्थितिक अखंडता को बेहतर ढंग से संरक्षित करते थे। उन्होंने चेतावनी दी कि समिति की 100-मीटर की सीमा छोटी पहाड़ी विशेषताओं को बाहर कर देगी, पर्वतमाला की निरंतरता को तोड़ देगी, और संभावित रूप से नए क्षेत्रों को माइनिंग के लिए खोल देगी। इस बीच, MoEFCC ने नई परिभाषा का बचाव करते हुए इसे सबसे व्यावहारिक और वैज्ञानिक रूप से सही नियम बताया जो सभी राज्यों में एकरूपता लाता है।

इसका मतलब है कि 'अरावली पहाड़ी' कतिथ अरावली पर्वतमाला के अंदर कोई भी भू-आकृति है जिसकी ऊंचाई लोकल रिलीफ से कम से कम 100 मीटर से  ऊपर है। लोकल रिलीफ को सबसे निचली कंटूर लाइन के संदर्भ में मापा जाएगा जो भू-आकृति को पूरी तरह से घेरती है। इस कंटूर के अंदर आने वाली सभी भूमि - पहाड़ी चोटियाँ, ढलान, तलहटी, सहायक इलाका - इसमें शामिल हैं।

कोर्ट ने अब क्या अनुमति दी है और किस पर रोक लगाई है?

सुप्रीम कोर्ट  बेंच, जिसमें तत्कालीन CJI बी.आर. गवई और जस्टिस के.वी. चंद्रन और एन.वी. अंजारिया शामिल थे, ने नई परिभाषा का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि यह सस्टेनेबल माइनिंग के लिए एक व्यापक मैनेजमेंट प्लान ('MPSM') को गाइड करेगा, जो पहले झारखण्ड के सारंडा वाइल्डलाइफ सेंचुरी के लिए कोर्ट द्वारा अप्रूव्ड प्लान जैसा ही होगा।

स्टेट ऑफ बिहार बनाम पवन कुमार, में अपने पहले के फैसले का हवाला देते हुए, बेंच ने कहा कि पूर्ण प्रतिबंध अक्सर गलत परिणाम देता है क्योंकि यह खनन को प्रच्छन्न (गुप्त ) कर देता है और स्थानीय माफियाओं को सशक्त बनाता है। मंत्रालय से एक, सतत खनन के लिए प्रबंधन योजना( MPSM) तैयार करने के लिए कहा गया ताकि "खनन के लिए अनुमत क्षेत्रों, पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील, संरक्षण-महत्वपूर्ण और अरावली परिदृश्य के भीतर बहाली-प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की पहचान की जा सके, जहां खनन पर सख्ती से प्रतिबंध लगाया जाएगा या केवल असाधारण और वैज्ञानिक रूप से उचित परिस्थितियों में अनुमति ही दी जाएगी; संचयी पर्यावरणीय प्रभावों और क्षेत्र की पारिस्थितिक वहन क्षमता का गहन विश्लेषण शामिल किया जाए; और खनन के बाद बहाली और पुनर्वास के विस्तृत उपाय शामिल किए जाएं।"

इस बीच, कोर्ट ने निर्देश दिया कि जब तक MPSM को अंतिम रूप नहीं दिया जाता और अप्रूव नहीं किया जाता, तब तक कोई नया खनन पट्टा या नवीनीकरण नहीं दिया जाएगा, जबकि मौजूदा कानूनी खनन कार्यों को पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों और MPSM के तहत निर्धारित किसी भी अतिरिक्त शर्तों के अनुपालन के अधीन जारी रखने की अनुमति दी जाएगी। इसने आगे आदेश दिया कि कोर्ट द्वारा अपनाई गई परिभाषा के आधार पर, कानूनी रूप से वैध पहाड़ियों और पर्वत श्रृंखलाओं को सीमांकित करने के लिए पूरे अरावली परिदृश्य की व्यापक भौगोलिक मैपिंग की जाए। जब ​​तक ऐसी मैपिंग पूरी नहीं हो जाती और MPSM लागू नहीं हो जाता, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसकी अपनाई गई परिभाषा सभी नियामक कार्यों, पर्यावरणीय मंजूरी और न्यायिक कार्यवाही के लिए प्रभावी और बाध्यकारी रहेगी।

नए नियम के तहत कम ऊंचाई वाली पहाड़ियां कैसे गायब हो सकती हैं

दशकों से, खनन और निर्माण पर सख्त प्रतिबंधों और खनन कार्यों में बड़े पैमाने पर अवैधता के कारण अरावली के व्यापक संरक्षण पर जोर दिया गया है। यह MoEFCC के 1992 के अरावली नोटिफिकेशन और नेशनल कैपिटल रीजन ('NCR') प्लानिंग बोर्ड द्वारा 2021 में अरावली में नेचुरल कंजर्वेशन ज़ोन की घोषणा सहित कई पॉलिसी में दिखता है। पहले के कोर्ट के आदेशों में पूरी अरावली सिस्टम को, ऊंचाई की परवाह किए बिना, इकोलॉजिकली सेंसिटिव माना गया था। एक्सपर्ट्स को डर है कि 100-मीटर का नियम अरावली के लैंडस्केप को इस तरह से बदल देगा जिससे सुरक्षा कमजोर होगी और यह पिछले कानूनों से अलग होगा।

2018 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त एक कमेटी ने पाया कि राजस्थान में 128 अरावली पहाड़ियों में से 31 अवैध खनन के कारण 50 सालों में गायब हो गईं, और अरावली में 10-12 बड़े गैप बन गए। राज्य ने उसी 100 मीटर के मापदंड का इस्तेमाल किया जिसे कोर्ट ने अब एक समान परिभाषा के रूप में स्वीकार कर लिया है।

इस साल मई में पीपुल फॉर अरावली कलेक्टिव द्वारा MoEFCC और हरियाणा सरकार को सौंपी गई 'द स्टेट ऑफ द हरियाणा अरावली: सिटिजन्स रिपोर्ट- पार्ट 1' के अनुसार, लाइसेंस प्राप्त खनन कार्यों ने चरखी दादरी और भिवानी जिलों में अरबों साल पुराने अरावली इकोसिस्टम के बड़े हिस्से को तबाह कर दिया है। गुरुग्राम, नूंह और फरीदाबाद में, 2009 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा इन जिलों में खनन पर रोक लगाने से पहले बड़े पैमाने पर खनन हुआ था।

प्रतिबंध के बावजूद, अवैध खनन खुलेआम जारी है। पिछले कुछ दशकों में, पूरी रेंज में अरावली का विनाश इतना व्यापक रहा है कि राजस्थान में अजमेर से झुंझुनू और दक्षिण हरियाणा में महेंद्रगढ़ तक एक दर्जन से ज़्यादा, बहुत बड़े बड़े गैप हो गये,जिससे थार रेगिस्तान की धूल दिल्ली-NCR में उड़कर आ रही है, जिससे क्षेत्र का वायु प्रदूषण और खराब हो रहा है।

अरावली के जंगल गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली में बारिश बढ़ाने, सूखे को रोकने और नमी बनाए रखने में एक ज़रूरी इकोलॉजिकल भूमिका निभाते हैं। इनकी कैनोपी हवा की गति को कंट्रोल करने और बारिश के पैटर्न को स्थिर करने में मदद करती है। यह रेंज एक ज़रूरी ग्राउंडवॉटर-रिचार्ज ज़ोन भी है, क्योंकि इसकी  चट्टानों की दरारें एक्विफर को काफी हद तक फिर से भरनेका काम करती हैं, जिसका एक  अनुमान के अनुसार,  प्रति हेक्टेयर लगभग दो मिलियन लीटर है। विशेषज्ञों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा मंज़ूर अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा, इन कम ऊंचाई वाली कई पहाड़ी प्रणालियों को खत्म करने, आवासों को सिकोड़ने और इंसान-वन्यजीव संघर्ष को बढ़ाने का खतरा पैदा करती है।

हाइड्रोजियोलॉजिस्ट डॉ. विधु शेखर बताते हैं, अरावली के नीचे के जल भंडार सभी आपस में जुड़े हुए हैंएक जगह से पहाड़ियों को तोड़ो, और हर जगह पानी का स्तर गिर जाता है (यह पानी के पाइप में छेद करने जैसा है, पूरा सिस्टम फेल हो जाता है। इस आपस में जुड़े होने का मतलब है कि एक जगह पर खनन का पूरे क्षेत्र पर असर पड़ता है, जिससे लाखों लोगों की पानी की सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है जो इन भूमिगत भंडारों पर निर्भर हैं।

यंहां कानून और लैंडस्केप के बीच एक नाज़ुक संतुलन है, जहाँ एक तकनीकी परिभाषा एक ऐसे इकोसिस्टम का भाग्य तय कर सकती है जो लाखों लोगों को गर्मी, धूल और पानी की कमी से बचाता है।

(सन्दर्भ/साभार – groundxero.in ,The leaflet ,The HinduJudgment-issue relating to definition of aravali hills and ranges, Image- Assessment of landuse dynamics of the Aravalli range (India) using integrated geospatial and CART approach by Alok Raj And L.K.Sharma )

धरती पानी  से संबंधित सूचनाओसमाचारों और सन्दर्भों का संकलनपानी पत्रक   पानी पत्रक- 273( 22 दिसम्बर 2025 ) जलधारा अभियान,221,पत्रकार कॉलोनी,जयपुर-राजस्थान,302020,संपर्क उपेन्द्र शंकर-7597088300.मेल-jaldharaabhiyan.jaipur@gmail.com



 

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