लोकसभा में केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री ने ई20 ईंधन को पर्यावरण और अर्थव्यवस्था के लिए सुरक्षित बताया, लेकिन विशेषज्ञों ने इंजन क्षति, माइलेज गिरावट, भूमि-जल संकट और खाद्य सुरक्षा पर गंभीर सवाल उठाए
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दिसंबर 2025 को ही लोकसभा में केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री ने बताया कि 20%
इथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल (ई20) पर्यावरण तथा अर्थव्यवस्था के लिए
लाभदायक है.उन्होंने बताया कि ईंधन के ई20 मिश्रण ने भारत में पहले ही कार्बन
उत्सर्जन में करीब 736
लाख मीट्रिक टन की कमी ला दी साथ ही सरकारी आंकड़ों के अनुसार अप्रैल 2014 से अब तक ई20 के प्रयोग से करीब 1.40 लाख करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बची
है .मंत्रालय के मुताबिक इसके इस्तेमाल से ,न तो प्रदर्शन में कोई गिरावट
देखी गई और न ही इंजन को क्षति हुई; ई20 ने हॉट/कोल्ड स्टार्ट परीक्षण भी बिना
समस्या के पास किए. इसलिए ‘पुरानी गाड़ियों को हटाने या बदलने की
आवश्यकता नहीं है.’
यंहा यह भी जान लें कि ई20 पेट्रोल
वह ईंधन है जिसमें 20%
इथेनॉल और 80% पारंपरिक पेट्रोल का मिश्रण होता है.
भारत सरकार इसे चरणबद्ध तरीके से पूरे देश में लागू कर रही है ताकि कच्चे तेल के
आयात पर निर्भरता कम हो,
किसानों को अतिरिक्त आय मिले और कार्बन
उत्सर्जन भी घटे.
पर्यावरण और कृषि वैज्ञानिकों की राय भी मिलीजुली है.
प्रमुख शोध परिणाम बताते हैं कि ई20 उपयोग से जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम होती है और कार्बन उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी आती है. हालांकि, शोधकर्ता आगाह करते हैं कि फायदों के साथ कुछ गंभीर नुकसान भी है. भारत में ई20 इथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल की स्थिरता पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला एक महत्वपूर्ण शोध पत्र दिसंबर 2025 में साइंस डायरेक्ट (Are ethanol-gasoline blends sustainable in India? A life cycle perspective on benefits and trade-offs -Chaitanya Kaduba Harde and Deepak Kumar Ojha)पर प्रकाशित हुआ है. यह सरकार के ‘हरित ईंधन क्रांति’ के दावों के ठीक उलट एक चिंताजनक तस्वीर सामने रखता है.
शोध के अनुसार, ई20 ईंधन का सबसे बड़ा पर्यावरणीय दबाव भूमि
और जल के अत्यधिक उपयोग से जुड़ा है. इथेनॉल उत्पादन का मुख्य स्रोत गन्ना है और
गन्ना खेती अपने आप में भारी पर्यावरणीय लागत के लिए बदनाम है.
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि एक लीटर इथेनॉल बनाने के लिए
औसतन 2,860 लीटर पानी की जरूरत होती है और यह केवल
सिंचाई के लिए आवश्यक पानी है. भारत के अधिकांश जिले पहले से ही पानी की कमी झेल
रहे हैं. ऐसे में ई20
लक्ष्य हासिल करने की दिशा में बढ़ना जल
संकट को कई गुना बढ़ा सकता है.
शोध–पत्र का अनुमान है कि यदि भारत अपने ई20 लक्ष्य पूरे कर लेता है, तो देश की वार्षिक सिंचाई जल मांग में 50 अरब घनमीटर की अतिरिक्त वृद्धि होगी. यह
पानी दिल्ली की 17
साल की कुल आवश्यक पानी की आपूर्ति के
बराबर है.
इसी तरह,
केवल मक्का की खेती के लिए अतिरिक्त 80 लाख हेक्टेयर भूमि की जरूरत पड़ेगी, जो भारत की कुल कृषि भूमि का लगभग एक
चौथाई है. लेकिन समस्या केवल जल और भूमि तक सीमित नहीं है. शोध में यह भी पाया गया
है कि: गन्ना खेती के कारण वन क्षेत्र घट रहे हैं, जंगलों
और चरागाहों का रूपांतर कृषि भूमि में हो रहा है, जैवविविधता
कम हो रही है, मिट्टी की उर्वरता और उसकी प्राकृतिक
संरचना तेजी से नष्ट हो रही है.
इथेनॉल उत्पादन प्रक्रिया के कारण अम्लीयता भी बढ़ती है, जिससे अम्ल वर्षा जैसी समस्याएं पैदा हो
सकती हैं और मिट्टी तथा जलाशयों का अम्लीकरण बढ़ता है.
खाद्य-सुरक्षा पर भी खतरा
जब गन्ना व मक्का जैसी फसलें ईंधन उत्पादन में लगने लगती हैं, तो खाद्य फसलों का हिस्सा घटता है और कीमतों
में बढ़ोतरी की आशंका बढ़ जाती है. यदि अनाज आधारित फसलें भी इथेनॉल उत्पादन में
बड़े पैमाने पर लगें,
तो खाद्य–मुद्रास्फीति
का खतरा और गंभीर हो सकता है.
यह शोध एक कड़ा संकेत है कि सरकार जिन दावों के साथ ई20 को ‘हरित
विकल्प’ के रूप में पेश कर रही है, उनके पीछे भारी–भरकम और दीर्घकालिक पर्यावरणीय लागत
छिपी हुई है.
यह लागत आने वाले दशकों में भारत की: जल–सुरक्षा, कृषि
विविधता, और पर्यावरणीय संतुलन को गहरे तौर पर
प्रभावित कर सकती है. खुद नीति आयोग ने स्वीकार किया है कि इतने बड़े बायोफ्यूल
लक्ष्यों को तभी आगे बढ़ाया जाना चाहिए, जब
ऐसी उन्नत तकनीकें उपलब्ध हों,
जो भूमि और जल की खपत को कई गुना कम कर
दें. लेकिन वास्तविकता यह है कि ऐसी कोई व्यावहारिक तकनीक अभी मौजूद नहीं है.
(सन्दर्भ
/ साभार – द वायर-हिंदी;इमेज -फेसबुक पेज मौसम केंद्र गंगानगर हनुमानगढ़ )
धरती पानी से संबंधित सूचनाओ, समाचारों और सन्दर्भों का संकलन–पानी पत्रक पानी पत्रक- 274( 28 दिसम्बर 2025 ) जलधारा अभियान,221,पत्रकार
कॉलोनी,जयपुर-राजस्थान,302020,संपर्क उपेन्द्र शंकर-7597088300.मेल-jaldharaabhiyan.jaipur@gmail.com


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