यह विरोध प्रदर्शन,महाराष्ट्र के पालघर जिले में भूमि स्वामित्व, बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स और मनरेगा में बदलाव को लेकर आदिवासी
समुदायों में गहरे असंतोष को दर्शाता है। सभी प्रदर्शनकारियों ने एक स्वर में कहा
कि जब तक “हमारे सभी कागज़ों पर मुहर नहीं लग जाती, हम घर नहीं जाएंगे।”
इस मार्च की मुख्य मांगें
इस प्रकार हैं: वन अधिकार अधिनियम का सख्ती से पालन; सभी मंदिर, इनाम और सरकारी जमीनें काश्तकारों के नाम करना; मनरेगा को बहाल करना; स्मार्ट मीटर योजना को रद्द करना; पेसा लागू करना;
श्रम कानूनों को रद्द करना; दहानू तटीय क्षेत्र में वधावन और मुरबे बंदरगाह परियोजनाओं को रद्द
करना; तथा पीने और सिंचाई के पानी, शिक्षा, रोजगार, राशन, स्वास्थ्य और अन्य सुविधायों
में बढोतरी करना और पालघर जिले की सरकारी सेवाओं में सभी रिक्त पदों पर नियुक्ति, घरकुल योजना का लाभ देना शामिल है।
रास्ते भर आदिवासी किसान माइक्रोफ़ोन पर विरोध गीत गाते हुए, CPI (M) के झंडे और बैनर लिए, नारे लगाते हुए चले। इनकी सबसे पुरानी और प्रमुख मांग भूमि अधिकारों को लागू करने की है। आदिवासी सदियों से जंगल और चरागाह की जमीन पर खेती करते आ रहे हैं, फिर भी वे उन ज़मीनों के मालिक नहीं हैं जिन पर वे सालों से खेती करते, पशु पलते और रहते हैं.
वन अधिकार अधिनियम, 2006, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पारंपरिक वनवासियों को वन भूमि और संसाधनों पर अधिकार देता है, जो पीढ़ियों से ऐसे क्षेत्रों में रह रहे हैं। वन भूमि और संसाधनों पर ग्राम सभाएं दावे शुरू करती हैं, जिनकी पुष्टि उप-विभागीय और जिला समितियों द्वारा की जाती है, और जब तक अधिकार तय नहीं हो जाते, तब तक निवासियों को बेदखली से संरक्षण दिया जाता हैऑल इंडिया किसान सभा (AIKS), सेंटर ऑफ इंडियन
ट्रेड यूनियंस (CITU), ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक विमेन एसोसिएशन
(AIDWA), डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन ऑफ इंडिया (DYFI), स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) और आदिवासी अधिकार
राष्ट्रीय मंच (AARM) के लोग बड़ी संख्या में इस मार्च में शामिल हुए हैं .
महाराष्ट्र में
सीपीआई-एम और उसके जनसंगठनों ने पहले भी कई बड़े लॉन्ग मार्च किए। 2018-19 में नासिक से मुंबई
तक, 2023 में अकोले से लोनी
तक मार्च किए गए, लेकिन विडंबना है
कि सरकार हर बार सिर्फ़ आश्वासन देकर आंदोलनकारियों को टाल देती है और उन्हें फिर
पुरानी मांगों को पूरी कराने के लिए सड़क पर उतरना पड़ता है। लेकिन अब आंदोलनकारी
शासन-प्रशासन की रणनीति समझ रहे हैं इसलिए वह अपनी मांगों के संबंध में लिखित में
स्पष्ट समय-सीमा मांग रहे थे। पालघर में तो लिखित आश्वासन मिला भी है अब देखना है
कि राज्य स्तरीय मांगों के संबंध में सरकार क्या फ़ैसला लेती है।
(सन्दर्भ /साभार – Sabrangindia ,
Newsclick,The Hindu)
धरती पानी से संबंधित सूचनाओ, समाचारों और सन्दर्भों का संकलन–पानी पत्रक पानी पत्रक- 284( 29जनवरी 2026 ) जलधारा अभियान,221,पत्रकार
कॉलोनी,जयपुर-राजस्थान,302020,संपर्क उपेन्द्र शंकर-7597088300.मेल-jaldharaabhiyan.jaipur@gmail.com



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