सोमवार, 25 मई 2026

2050 में पृथ्वी: पर्यावरण में गिरावट का एक भयावह नज़ारा

 9 दिसम्बर 2025 को जारी, UN की रिपोर्ट के अनुसार,जानलेवा लू, प्रदूषित हवा, प्रजातियों के विलुप्त होने और आर्थिक संकटों का अनुमान, प्रदूषण से भरा आसमान- आने वाले दशकों का यह भयावह नज़ारा हो सकता है - अगर कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए तो - संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) द्वारा प्रकाशित 'ग्लोबल एनवायरनमेंट आउटलुक' (GEO-7) के सातवें संस्करण में यह सब विस्तार से बताया गया है।

1300 पन्नों की इस रिपोर्ट का शीर्षक है: 'एक ऐसा भविष्य जिसे हम चुनते हैं: पृथ्वी में निवेश करने से सभी को खरबों डॉलर का फ़ायदा कैसे हो सकता है।' इसमें पाया गया है कि जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता का नुकसान, ज़मीन का बंजर होना, मरुस्थलीकरण, और प्रदूषण व कचरे ने पृथ्वी, लोगों और अर्थव्यवस्थाओं पर भारी असर डाला है, और हर साल खरबों डॉलर का नुकसान हो रहा है। अगर सरकारें मिलकर कदम उठाने में ढिलाई करती रहीं, तो अरबों लोगों को एक अनिश्चित भविष्य का सामना करना पड़ेगाखासकर विकासशील देशों में रहने वाले लोगों को।

UNEP की कार्यकारी निदेशक इंगर एंडरसन ने कहा, "ग्लोबल एनवायरनमेंट आउटलुक मानवता के सामने एक सीधा-सा विकल्प रखता है: या तो उस रास्ते पर चलते रहें जो जलवायु परिवर्तन, घटती प्रकृति, बंजर ज़मीन और प्रदूषित हवा से तबाह भविष्य की ओर ले जाता है; या फिर अपनी दिशा बदलकर एक स्वस्थ पृथ्वी, स्वस्थ लोग और स्वस्थ अर्थव्यवस्थाएँ सुनिश्चित करें। असल में, यह कोई विकल्प ही नहीं है।"

82 देशों के 287 अलग-अलग विषयों के वैज्ञानिकों द्वारा तैयार की गई GEO-7, अब तक का वैश्विक पर्यावरण का सबसे व्यापक वैज्ञानिक आकलन है। यह दिखाता है कि अगर देश प्रदूषण फैलाना, ग्रीनहाउस गैसें छोड़ना और प्राकृतिक जगहों को नष्ट करना जारी रखते हैं, तो 2050 तक हमारी पृथ्वी का क्या हाल होगा।

ये इसकी कुछ मुख्य बातें हैं:

जानलेवा लू- पृथ्वी को गर्म करने वाली ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन 2050 तक बढ़कर हर साल 75 अरब टन होने का अनुमान हैजो आज के मुकाबले लगभग 50 प्रतिशत ज़्यादा है। इससे जलवायु अस्थिर हो जाएगी और लू की घटनाओं में भारी बढ़ोतरी होगी; अनुमान है कि 2050 तक पृथ्वी पर लगभग हर इंसानयानी करीब 9.2 अरब लोगइसकी चपेट में आ जाएँगे। पृथ्वी का शायद ही कोई ऐसा कोना बचेगा जो इस भीषण गर्मी से अछूता रहे।

संसाधनों का विनाशकारी दोहन- 2050 तक, इंसान हर साल पृथ्वी से 165 अरब टन कच्चा माल निकाल रहे होंगे। यह 2020 के मुकाबले 60 प्रतिशत से ज़्यादा की बढ़ोतरी दिखाता है। GEO-7 का कहना है कि इन सभी धातुओं, खनिजों और जीवाश्म ईंधनों को निकालने से कई प्राकृतिक जगहें तबाह हो जाएंगी, जिससे जलवायु परिवर्तन और बिगड़ेगा और जैव विविधता का नुकसान बढ़ेगा।

आर्थिक गिरावट- अकेले जलवायु परिवर्तन की वजह से 2050 तक हर साल दुनिया की कुल GDP में 4 प्रतिशत की कमी आने की उम्मीद है। जैसे-जैसे तापमान बढ़ेगा और संकट गहराएगा, यह आंकड़ा 2100 तक बढ़कर चौंका देने वाले 20 प्रतिशत तक पहुंच जाएगा। यह 1920 और 1930 के दशक की 'महामंदी' (Great Depression) के दौरान अमेरिका को हुए नुकसान से बस थोड़ा ही कम होगा। प्रदूषण और प्रकृति के खत्म होने के असर से यह गिरावट और भी बढ़ जाएगी। इस आर्थिक उथल-पुथल से सबसे ज़्यादा नुकसान गरीबों को होगा और उनके तथा अमीरों के बीच की खाई लगातार चौड़ी होती जाएगी।

वायु प्रदूषण-GEO-7 का अनुमान है कि 2050 तक वायु प्रदूषण में थोड़ी कमी आएगी, लेकिन बढ़ते शहरीकरण का मतलब है कि हवा में मौजूद प्रदूषकों के संपर्क में आने वाले लोगों की कुल संख्या बढ़ जाएगी। 2050 तक, 4.2 अरब लोग नियमित रूप से एक खास तौर पर खतरनाक पदार्थ, PM 2.5, के खतरनाक स्तर को सांस के ज़रिए अपने अंदर लेंगे। रिपोर्ट का अनुमान है कि 2060 तक वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों की वजह से दुनिया की अर्थव्यवस्था को 18-25 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का नुकसान होगा।

खत्म होते इकोसिस्टम- दुनिया 10 लाख वर्ग किलोमीटर जंगल, पीटभूमि और दूसरी प्राकृतिक जगहें खो देगी। इसकी मुख्य वजह बढ़ती आबादी को खाना खिलाने के लिए खेती की ज़मीन का विस्तार करना है, क्योंकि इस आबादी में मांस खाने का चलन बढ़ रहा है। इकोसिस्टम के नुकसान की वजह से, ग्रह की औसत प्रजाति बहुतायत एक ऐसा आंकड़ा जो जीवन की विविधता और फैलाव को दिखाता है में 3 प्रतिशत की गिरावट आने की उम्मीद है।

बाढ़ और सूखा- अगर जलवायु परिवर्तन को बिना रोक-टोक के बढ़ने दिया गया, तो 2050 तक लगभग 1.1 अरब और लोग भारी बारिश की चपेट में आ जाएंगे और 90 करोड़ और लोग भीषण सूखे का सामना करेंगे। जलवायु की यह दोहरी मार 2040 तक 13.2 करोड़ लोगों को गरीबी में धकेल देगी और 2.4 करोड़ और लोगों को भूख के खतरे में डाल देगी। 2050 तक, 3.3 अरब लोग यानी ग्रह की एक तिहाई आबादी पानी की कमी का सामना करेगी।

टिपिंग पॉइंट्स- GEO-7 चेतावनी देता है कि दुनिया जलवायु से जुड़ी ऐसी कई सीमाओं के करीब पहुँच रही है, जहाँ से शायद वापस लौटना मुमकिन न हो। ग्रीनलैंड और पश्चिमी अंटार्कटिका की बर्फ की चादरें टूटकर गिर सकती हैं, जिससे समुद्र का जलस्तर 10 मीटर तक बढ़ सकता है। पिघलती हुई पर्माफ्रॉस्ट से भारी मात्रा में मीथेन गैस निकल सकती हैजो एक बहुत ही शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस हैऔर इससे धरती का तापमान तेज़ी से बढ़ सकता है। अमेज़न के वर्षावन सूखकर सवाना में बदल सकते हैं, जिससे धरती अपने सबसे महत्वपूर्ण 'कार्बन सिंक' में से एक को खो देगी। लगभग सभी गर्म पानी वाली मूँगा चट्टानें (कोरल) खत्म हो जाएँगी, जिससे समुद्र के नीचे का इकोसिस्टम तबाह हो जाएगा और दुनिया भर में मछली पालन का काम खतरे में पड़ जाएगा। यहाँ तक कि समुद्र की धाराएँ और जेट स्ट्रीम भी प्रभावित हो सकती हैं, जिससे पूरी जलवायु व्यवस्था ही गड़बड़ा जाएगी।

समय कम है- GEO-7 का कहना है कि हालात जितने भी गंभीर हों, धरती का भविष्य पत्थर की लकीर नहीं है। इंसानों के पास क्लाइमेट चेंज, नेचर के नुकसान और प्रदूषण से निपटने का समय है। लेकिन इसके लिए देशों को अपनी इकॉनमी को चलाने, सामान और कचरे को संभालने, एनर्जी बनाने, खाना बनाने, कच्चे माल का इस्तेमाल करने और पर्यावरण का ध्यान रखने के तरीकों में तुरंत और पहले कभी नहीं हुए बदलाव करने होंगे।

(इस आर्टिकल में यूनाइटेड नेशंस एनवायरनमेंट प्रोग्राम का दिया हुआ मटीरियल शामिल है।)

अधिक जानकारी के लिये -Global Environment Outlook 7: A future we choose – Why investing in Earth now can lead to a trillion-dollar benefit for all

 (सन्दर्भ /साभार –Climate and Capitalism, UNEP)

  जल से संबंधित सूचनाओ, समाचारों और सन्दर्भों का संकलनपानी -पत्रक

पानी पत्रक- 317( 26 मई 2026 ) जलधारा अभियान-जयपुर -संपर्क- उपेन्द्र शंकर-7597088300.मेल-jaldharaabhiyan.jaipur@gmail.com



  

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