जब हम किसी क्षेत्र में अवैध खनन की बात करते हैं, तो हम सिर्फ़ खनिजों और बाज़ारों की बात नहीं कर रहे होते। हम लोगों की बात कर रहे होते हैं। हम उस नाज़ुक लकीर की बात कर रहे होते हैं जो अस्तित्व को शोषण से जोड़ती है, और उस नदी की बात कर रहे होते हैं जो लाखों जिंदगियों को आपस में बांधती है।
गोल्डन ट्रायंगल — (2,00,000 वर्ग किलोमीटर का एक पहाड़ी क्षेत्र है, जहाँ थाईलैंड, लाओस और म्यांमार, रुआक और मेकांग नदियों के संगम पर मिलते हैं )-में एक पर्यावरणीय और मानवाधिकारों से जुड़ा संकट गहराता जा रहा है।
बिना किसी नियमन के हो रहे 'रेयर-अर्थ' (दुर्लभ-मृदा) खनन ने नदियों को ज़हरीला
बना दिया है, संरक्षित जंगलों को तबाह कर दिया है, और समुदायों को अस्तित्व के लिए संघर्ष
करने पर मजबूर कर दिया है। लेकिन हर खदान और ज़हरीले बहाव के पीछे कुछ और भी
ज़्यादा काला सच छिपा है: कमज़ोर लोगों, खासकर लड़कियों का शोषण; जो निष्कर्षण और चुप्पी पर टिकी अर्थव्यवस्था में 'कोलेटरल डैमेज' (अप्रत्यक्ष नुकसान) बनकर रह जाती हैं।
एक कहावत है-अन्याय शायद ही
कभी अकेला आता है। जब ग्रह का शोषण होता है, तो लोगों का भी होता है। मेकांग एक ऐसी नदी की कहानी है जो संकट में
घिरी है — और उन समुदायों की कहानी कहती है जो अपनी गरिमा और अपने भविष्य, दोनों को वापस पाने के लिए लड़ रहे
हैं।
मेकांग में अवैध खनन का
बढ़ता बोलबाला
आधुनिक दुनिया के लिए 'रेयर-अर्थ' खनिज बहुत ज़रूरी हैं — आपके फ़ोन में लगे मैग्नेट, आपकी कार की बैटरी, और आपके घर को बिजली देने वाले पवन
टर्बाइन, सभी में इनका इस्तेमाल होता है। लेकिन
इस सुविधा की कीमत दक्षिण-पूर्व एशिया के सबसे अंधेरे कोनों में गहराई से छिपी हुई
है।
उत्तरी लाओस में, आधिकारिक प्रतिबंध के बावजूद 'रेयर-अर्थ' खनन तेज़ी से बढ़ा है। सैटेलाइट
तस्वीरों से पता चलता है कि पहाड़ियों में 27 से ज़्यादा खनन स्थल बनाए गए हैं; इनमें से कई संरक्षित "ग्रे ज़ोन" के अंदर हैं और उस नदी
की सहायक नदियों के पास हैं जो विशाल मेकांग नदी को जल प्रदान करती हैं। इन खदानों
से निकलने वाला ज़हरीला कचरा बहकर नीचे की ओर जाता है, जिससे पानी, मिट्टी और यहाँ तक कि लोगों का भोजन भी
दूषित हो जाता है।
( गोल्डन ट्रायंगल क्षेत्र में खदानों और प्रभावित नदियों के स्थान। डेटा: Planet Labs, Stimson ).
ऐसा क्यों होता है? निगरानी का बेहद कमज़ोर होना।
भ्रष्टाचार। और विदेशी निवेशक — अक्सर चीनी कंपनियाँ — जो नियमों से बचने के लिए स्थानीय अधिकारियों के साथ
"साझेदारी" कर लेते हैं। भारी विदेशी कर्ज़ के बोझ तले दबा लाओस, निष्कर्षण से जुड़े स्वार्थी तत्वों के
लिए एक आसान शिकार बन गया है।
अमेरिका इस्तिथ स्टिमसन सेंटर के शोध के अनुसार, मुख्य भूमि दक्षिण-पूर्व एशिया में खनन
गतिविधियाँ तेज़ी से बढ़ रही हैं, और हम अभी-अभी स्थानीय समुदायों और जलीय जीवन पर पड़ने वाले इसके
व्यापक प्रभाव को समझना शुरू ही कर रहे हैं। उनके विश्लेषण से यह बात सामने आती है
कि म्यांमार, लाओस और उत्तरी थाईलैंड में बिना किसी
नियमन के हो रहा 'रेयर-अर्थ' निष्कर्षण, नदियों के तंत्र को आर्सेनिक, पारा और कैडमियम जैसे तत्वों से कैसे
ज़हरीला बना रहा है।
एक बात साफ़ है: मेकांग का संकट और भी
गहराता जा रहा है। यह सिर्फ़ लाओस में रेयर अर्थ माइनिंग और मानवाधिकारों के
उल्लंघन के बारे में नहीं है। यह एक ऐसे सिस्टम के बारे में है जो लंबे समय की
भलाई को थोड़े समय के मुनाफ़े के लिए बेच देता है और इसका खामियाज़ा गरीबों को
भुगतना पड़ता है।
खदानों में छिपी मानव
तस्करी की पाइपलाइन-
जहाँ भी हम अवैध माइनिंग देखते हैं, वहाँ हमें मानव तस्करी और ज़बरदस्ती
मज़दूरी भी उससे जुड़ी हुई मिलती है। 'गोल्डन ट्रायंगल' के मामले में भी यही सच है; शोषण के ये दोनों रूप जुड़वाँ भाई जैसे हैं।
माइनिंग से पैसा आता है,और जहाँ बिना किसी जवाबदेही के पैसा
बहता है, वहाँ लोगों को खरीदा और बेचा जाता है।
सीमावर्ती इलाकों के उन अनियंत्रित क्षेत्रों में, कमज़ोर लोग—जिनमें से कई पहाड़ी जनजातियों के मूल
निवासी होते हैं—पैसे कमाने की आस में वहाँ पहुँचते
हैं। उनमें से कई कभी घर वापस नहीं लौट पाते। वे आम तौर पर जातीय अल्पसंख्यक और
शरणार्थी होते हैं—और कई मामलों में, लड़कियाँ होती हैं—जिन्हें नौकरी का वादा किया जाता है, लेकिन असल में वे गुलामी में फँस जाती
हैं।
लाओस के बदनाम 'गोल्डन ट्रायंगल स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन' में, कसीनो, तस्करी और माइनिंग—ये तीनों ही एक ही तरह की 'शोषण-आधारित अर्थव्यवस्था' में आपस में जुड़े हुए हैं। जब नदियाँ
ज़हरीली हो जाती हैं और खेत बंजर हो जाते हैं, तो और भी ज़्यादा परिवारों को अपना घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ता
है। वही परिवार—जो बेघर और बेबस हो चुके होते हैं—तस्करों के जाल में सबसे आसानी से फँस
जाते हैं।
यह चक्र बहुत ही क्रूर
और सीधा-सादा है-
पर्यावरण का विनाश → आर्थिक तंगी → शोषण → और भी ज़्यादा विनाश पर्यावरण और समुदाय का।
इस चक्र को तोड़ने के लिए सिर्फ़
कानूनों की ज़रूरत नहीं होती। इसके लिए दूसरे विकल्पों की भी ज़रूरत होती है। जब
लोगों को अवसर मिलते हैं,
और जब वे अपनी मर्ज़ी से पैसे कमा सकते
हैं, अपनी चीज़ों के मालिक बन सकते हैं और
अपनी ज़िंदगी की बागडोर खुद संभाल सकते हैं, तो शोषण करने वालों की ताकत अपने-आप कमज़ोर पड़ जाती है।
मेकांग नदी की सहायक
नदियों में पर्यावरण का विनाश (Ecocide)
जब आप सुबह-सवेरे मेकांग नदी के किनारे खड़े होते हैं, तो लाओस की पहाड़ियों पर सुनहरी रोशनी बिखर जाती है और बढ़ती हुई रोशनी में नदी भी चमकने लगती है। लेकिन अब उस चमक के पीछे ज़हर छिपा हुआ है।
उत्तरी म्यांमार और लाओस के इलाकों में, 'इन-सीटू लीचिंग' (in-situ leaching) [इन-सीटू लीचिंग (ISL), या इन-सीटू रिकवरी (ISR), एक माइनिंग तकनीक है
जिसके ज़रिए खनिजों—मुख्य रूप से यूरेनियम और तांबे—को ज़मीन के नीचे मौजूद
अयस्क भंडार में ही, रासायनिक घोल (लिक्सीविएंट्स) का इस्तेमाल करके सीधे
घोलकर निकाला जाता है। बोरहोल के ज़रिए तरल पदार्थ इंजेक्ट किए जाते हैं, जो खनिजों को घोल देते
हैं, और फिर उन्हें
"प्रेग्नेंट सॉल्यूशन" के तौर पर वापस पंप कर लिया जाता है। यह कम
खर्चीली है और इसका बहारी पर्यावरण पर भी कम
असर पड़ता है, ऐसा माना जाता है ] जो कि 'रेयर अर्थ' खनिजों को निकालने का सबसे ज़्यादा
इस्तेमाल होने वाला तरीका है—के कारण ज़मीन में तेज़ाब और भारी धातुएँ (heavy metals) भर जाती हैं। यह ज़हरीला पानी रिसकर उन
सहायक नदियों में मिल जाता है जो दक्षिण की ओर बहते हुए थाईलैंड और कंबोडिया तक
पहुँचती हैं; अपने साथ ये नदियाँ कैडमियम, मैंगनीज़, आर्सेनिक, पारा (mercury) और अन्य ज़हरीले तत्वों को भी बहाकर ले जाती हैं।
थाई अधिकारियों ने 'कोक' और 'साई-रुआक' जैसी नदियों के पानी की जाँच की है।
जाँच के नतीजे बेहद चिंताजनक हैं: पानी में प्रदूषण का स्तर, इंसानी सेहत के लिए सुरक्षित मानी जाने
वाली सीमा से कई गुना ज़्यादा पाया गया है। मछलियाँ मर रही हैं। बच्चे बीमार पड़
रहे हैं। किसानों की पैदावार घट रही है — माना जा रहा है कि इससे मछली पालन, पर्यटन और खेती के क्षेत्रों में कुल 40 मिलियन यू एस डालर का नुकसान होगा। और क्योंकि मेकांग नदी
कई देशों की सीमाएँ पार करती है, इसलिए इसका दुख भी सीमाओं के पार तक पहुँच रहा है।
यह पारिस्थितिकी तंत्र का विनाश है। एक
ऐसे पारिस्थितिकी तंत्र का जानबूझकर किया गया विनाश जो 5 करोड़ से अधिक लोगों का जीवन निर्वाह
करता है। और पारिस्थितिकी तंत्र का विनाश मानव तस्करी या जबरन श्रम से अलग नहीं है; यह प्रकृति और मनुष्यों दोनों पर लागू
की गई उपेक्षा की समान मानसिकता है। जब नदी सूख रही होती है, तो उस पर निर्भर लोगों की आजीविका भी
छिन जाती है। और जब आजीविका समाप्त हो जाती है, तो तस्कर सक्रिय हो जाते हैं।
जब भी कोई उत्तरी थाईलैंड का दौरा करता
है , तो ऐसी युवा लड़कियों मिल जाती हैं
जिनकी कहानियाँ इस संकट को जी रही हैं। उनके परिवार कभी सीमा के पास उपजाऊ भूमि पर
खेती करते थे। अब, प्रदूषित मिट्टी और काम न होने के कारण, कई लड़कियों को "नौकरी"
खोजने के लिए भेजा जाता है - अक्सर खानों, साइबर अपराध केंद्रों या यौन व्यापार में।
दक्षिण-पूर्व एशिया में अवैध खनन यही
करता है- यह हर मौजूदा दरार को चौड़ा कर देता है। गरीबी, लिंगभेद, राज्यविहीनता,
जलवायु परिवर्तन। ये सभी उन लड़कियों के जीवन में टकराते हैं जो इतनी छोटी हैं कि
उन्हें पता ही नहीं कि उन्होंने क्या खोया है।
मेकोंग क्षेत्र में अवैध खनन की कहानी
केवल पर्यावरण या अर्थव्यवस्था के बारे में नहीं है, बल्कि यह एक क्षेत्र की आत्मा के बारे में है। जब नदियाँ प्रदूषित
होती हैं और समुदाय खोखले हो जाती हैं, तो हम केवल पारिस्थितिकी तंत्र ही नहीं खोते; हम भविष्य खो देते हैं।
(सन्दर्भ /साभार –Not
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पानी से संबंधित सूचनाओ, समाचारों और सन्दर्भों का
संकलन–-पानी पत्रक




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