शनिवार, 1 अगस्त 2026

बड़ी तेल कंपनियों ने प्लास्टिक प्रदूषण संधि को कैसे रोका

 अगस्त 2025 में दस (5–15 अगस्त, 2025)तनावपूर्ण दिनों तक, जिनेवा में एक ऐतिहासिक ग्लोबल प्लास्टिक संधि की दिशा में अंतिम प्रयास की उम्मीद की जा रही थी। लेकिन, 183 देशों के प्रतिनिधियों वाली इंटरगवर्नमेंटल नेगोशिएटिंग कमेटी, की बैठक बिना किसी नतीजे के खत्म हो गई: न तो कोई ड्राफ्ट संधि बनी, न ही बातचीत दोबारा शुरू करने की कोई समय-सीमा तय हुई, औरसबसे चिंताजनक बातग्रह के सबसे गंभीर पर्यावरणीय संकटों में से एक से निपटने के लिए कोई साझा विज़न नहीं बन पाया।

(संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की कार्यकारी निदेशक इंगर एंडरसन, 5 अगस्त 2025 को शुरू हुई बातचीत में शुरुआती भाषण देती हुईं-इमेज साभार –CNN )

मशहूर इको सोशलिस्ट,इयान एंगस के मुताबिक सालों तक UN की जलवायु परिवर्तन बातचीत को देखने के बाद, उनका इस पूरी प्रक्रिया के प्रति नज़रिया थोड़ा निराशावादी हो गया है।  उनके अनुसार आम तौर पर बहुत सारी बातें होती हैं, लेकिन जीवाश्म ईंधन का बहुत कम ज़िक्र होता है, और कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती। जब 2015 के पेरिस समझौते जैसे कमज़ोर समझौते को एक बड़ी उपलब्धि बताया जाता है, तो आप समझ जाते हैं कि उम्मीदें बहुत कम रखी गई हैं।

संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्लास्टिक प्रदूषण को खत्म करने के लिए संधि की मांग करने के तीन साल बाद, जिनेवा में 5 से 15 अगस्त 2025 तक हुई ,अंतरराष्ट्रीय बातचीत विफल हो गई। तेल उत्पादक देशों के एक छोटे समूह और उनके कॉर्पोरेट सहयोगियों ने पूरी प्रक्रिया को सफलतापूर्वक रोक दिया और अंततः पटरी से उतार दिया।

यह विफलता सिर्फ़ प्रक्रियात्मक रुकावट नहीं है; यह एक गंभीर चेतावनी है। प्लास्टिक प्रदूषण बेरोकटोक बढ़ रहा है; इसका सालाना उत्पादन अब 460 मिलियन टन से ज़्यादा हो गया है और अनुमान है कि 2060 तक यह लगभग तीन गुना बढ़कर 1.2 बिलियन टन हो जाएगा (OECD)। अभी तक उस प्लास्टिक का केवल 9% ही रीसायकल हो पाता है। बाकी को लैंडफिल में डाल दिया जाता है, जला दिया जाता है, या यह मिट्टी, नदियों और महासागरों में रिस जाता हैजिससे हर साल पर्यावरण में पहले से ही फैल रहे 20 मिलियन टन प्लास्टिक में और बढ़ोतरी होती है। जिनेवा वार्ता की विफलता एक खतरनाक यथास्थिति को बनाए रखती है।

 (  इमेज साभार –Health policy watch )

बातचीत एक जाने-पहचाने भू-राजनीतिक विभाजन के आधार पर बिखर गई। छोटे द्वीपीय देशों, EU सदस्यों और कई अफ़्रीकी और लैटिन अमेरिकी देशों के नेतृत्व वाले एक महत्वाकांक्षी गठबंधन ('हाई एम्बिशन कोएलिशन टू एंड प्लास्टिक पॉल्यूशन') ने बाध्यकारी लाइफसाइकल नियंत्रणों पर ज़ोर दिया: उत्पादन की सीमाएं, रसायनों का चरणबद्ध तरीके से इस्तेमाल बंद करना और उत्पादक की विस्तारित ज़िम्मेदारी।

दूसरी ओर, पेट्रोकेमिकल ब्लॉकजिसमें अमेरिका, सऊदी अरब, रूस और UAE शामिल थेने इस बात पर ज़ोर दिया कि संधि का ध्यान केवल डाउनस्ट्रीम "समाधानों" जैसे कि एडवांस्ड रीसाइक्लिंग पर हो, और उत्पादन की सीमाओं का कोई ज़िक्र न हो। विशेष रूप से अमेरिका ने सीमाओं के प्रति पहले दिखाए गए खुलेपन के रुख को बदल दिया और ड्राफ्ट टेक्स्ट से "पूरे लाइफसाइकल" वाले प्रावधानों को हटाने की मांग की।

बातचीत की एक अच्छी बात यह रही कि 'हाई एम्बिशन कोएलिशन टू एंड प्लास्टिक पॉल्यूशन' (HAC) (74 देशों का यह समूह , जिसकी सह-अध्यक्षता रवांडा और नॉर्वे ने की) समूह कड़े और अनिवार्य नियमों के एक व्यापक सेट की मांग पर मजबूती से अड़ा रहा और इससे कम कुछ भी स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

HAC ने जिन उपायों की मांग की, उनमें शामिल थे:

          प्राथमिक प्लास्टिक पॉलिमर के उत्पादन को टिकाऊ स्तर तक कम करना;

          सबसे हानिकारक प्लास्टिक उत्पादों और रसायनों, खासकर सिंगल-यूज़ प्लास्टिक को धीरे-धीरे खत्म करना;

          रासायनिक एडिटिव्स को नियंत्रित करना, जिसमें प्लास्टिक और प्लास्टिक उत्पादों की रासायनिक संरचना का पूरी तरह से खुलासा करना अनिवार्य हो;

          प्लास्टिक उत्पादों की रासायनिक जटिलता को कम करना और ऐसे उत्पाद डिज़ाइन सुनिश्चित करना जिनसे दोबारा इस्तेमाल और रीसाइक्लिंग संभव हो सके;

          प्लास्टिक उत्पादकों को उनके द्वारा उत्पादित और बेचे जाने वाले मटीरियल की रिकवरी, रीसाइक्लिंग या सही तरीके से निपटान के लिए आर्थिक और कानूनी रूप से ज़िम्मेदार बनाना;

          कचरा प्रबंधन के बुनियादी ढांचे, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और क्षमता निर्माण के लिए फंडिंग;

          संधि बातचीत की प्रक्रियाओं में बदलाव करना और सर्वसम्मति से समझौते की ज़रूरत को खत्म करना;

          संधि का मुख्य उद्देश्य केवल पर्यावरण की सुरक्षा नहीं, बल्कि इंसानी सेहत की सुरक्षा को भी बनाना।

इन खास उपायों के पीछे मूल मांग यह थी कि संधि में प्लास्टिक के पूरे जीवनचक्र पर ध्यान दिया जाएजीवाश्म ईंधन फीडस्टॉक निकालने से लेकर उत्पादन, डिज़ाइन, इस्तेमाल और जीवन के अंत (निपटान) तकन कि केवल बाद के कचरा प्रबंधन पर।

इनमें से हर बिंदु को "अच्छे विचारों" से एक प्रभावी और लागू करने योग्य संधि में बदलने के लिए काफी विस्तार से काम करने की ज़रूरत होगी। फिर भी, 'हाई एम्बिशन ग्रुप' के प्रस्तावों ने वैश्विक प्लास्टिक संकट से निपटने के लिए एक ठोस आधार प्रदान किया। ज़ाहिर है, पेट्रो-स्टेट्स (वे देश जिनकी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाएँ और राजनीतिक प्रणालियाँ तेल और प्राकृतिक गैस के निर्यात और उससे होने वाली आय पर बहुत ज़्यादा निर्भर हैं ) और पेट्रोकेमिकल इंडस्ट्री को यह बात पसंद नहीं आई।

(  इमेज साभार –wikimedia commons )

सऊदी अरब और रूस के नेतृत्व वाले और अनौपचारिक रूप से अमेरिका का समर्थन पाने वाले "लाइक-माइंडेड ग्रुप" (LMG) ने किसी भी ऐसी योजना का विरोध किया जो प्लास्टिक के उत्पादन को किसी भी तरह से सीमित या नियंत्रित करती। उनका तर्क था कि संधि का एकमात्र उद्देश्य कचरा इकट्ठा करने और रीसाइक्लिंग में सुधार करना होना चाहिएऔर संधि स्वैच्छिक होनी चाहिए, कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं।

प्लास्टिक के पक्ष में यह तर्क दिया जाता है कि ऊर्जा की खपत कम करने के लिए, "दुनिया को प्लास्टिक पर कम नहीं, बल्कि ज़्यादा निर्भर रहने की ज़रूरत होगी।"

 “लाइक-माइंडेड ग्रुप"  को जीवाश्म ईंधन और केमिकल इंडस्ट्री के 234 लॉबिस्टों और पैकेजिंग बनाने वाली कंपनियों तथा कोका-कोला और नेस्ले जैसी कंज्यूमर गुड्स कंपनियों के 60 प्रतिनिधियों का समर्थन मिला। बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों में डॉव (Dow) और अमेरिकन केमिस्ट्री काउंसिल शामिल थे, जिन्होंने सात-सात लॉबिस्ट भेजे थे, और एक्सॉनमोबिल (ExxonMobil) ने छह लॉबिस्ट भेजे थे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जीवाश्म ईंधन और केमिकल इंडस्ट्री के कुछ लॉबिस्ट आधे दर्जन देशों के आधिकारिक प्रतिनिधिमंडलों के सदस्य के रूप में शामिल हुए: इससे उन्हें उन बंद सत्रों में भाग लेने का मौका मिला जिनमें स्वतंत्र वैज्ञानिक, आदिवासी कार्यकर्ता और अन्य पर्यवेक्षक शामिल नहीं थे।

 (  इमेज साभार –statista )

जीत न पाने पर, लॉबिस्टों ने अपनी संख्या और संसाधनों का इस्तेमाल करके कार्यवाही में देरी की और बाधा डाली, जिससे छोटी-छोटी बातों पर भी सहमति बनाने की हर कोशिश नाकाम हो गई। सर्वसम्मति की ज़रूरत वाले नियमों और अमेरिका के ज़बरदस्त पर्दे के पीछे के दबाव के कारण, बैठक में कोई असरदार संधि का ड्राफ़्ट तक तैयार नहीं हो सका, उसे पास करना तो दूर की बात थी। एनवायरनमेंटल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी के एक सदस्य ने बताया:

हमारी समीक्षा से विफलता का असली कारण पता चलापेट्रोकेमिकल बनाने वाले देशों का एक छोटा लेकिन ताकतवर गुट और 'बिग ऑयल' लॉबिस्टों की एक बड़ी फ़ौज ने जान-बूझकर प्रगति में बाधा डाली। उनकी चालों में कार्यवाही को लटकाना, लक्ष्यों को कमज़ोर करना और आम सहमति को रोकना शामिल था, जिससे बातचीत बिना किसी नतीजे के खत्म हो गई। इस पर ध्यान न देने के कारण, संधि के अहम हिस्सेजैसे उत्पादन की सीमा, केमिकल पर नियंत्रण और व्यापार के नियमइतने कमज़ोर हो गए कि उन्हें ठीक नहीं किया जा सकता था।”#

 इंडस्ट्री के लॉबिस्टों ने उन वैज्ञानिकों को भी परेशान किया और धमकाया जो मज़बूत संधि का समर्थन कर रहे थे। 'साइंटिस्ट्स कोएलिशन फ़ॉर एन इफेक्टिव प्लास्टिक ट्रीटी' का प्रतिनिधित्व करने वाली प्रोफ़ेसर बेथानी कार्नी एल्मरोथ ने 'द गार्डियन' को बताया कि प्लास्टिक पर रिसर्च करने वालों को तंबाकू उद्योग वाली चालोंका सामना करना पड़ा: विज्ञान पर सवाल उठाना, बताने वाले पर सवाल उठाना, लोगों की आवाज़ दबाने की कोशिश करना और लोगों की विश्वसनीयता को कम करने की कोशिश करना।

(  इमेज साभार –plastic technology)

दस दिन की बेकार बहस के बाद, अध्यक्ष ने एक ड्राफ़्ट पेश किया, जिसके बारे में उन्हें लगा कि इसमें अब तक बनी आम सहमति शामिल है। इसमें 'पूरे जीवन-चक्र' (full life cycle) के नज़रिए, स्वास्थ्य, ज़हरीले एडिटिव्स पर रोक, सिंगल-यूज़ प्लास्टिक, उत्पादन में कमी, अनिवार्य रिपोर्टिंग या वोटिंग प्रक्रिया में बदलाव के बारे में कुछ भी शामिल नहीं था। जैसा कि पनामा के प्रतिनिधि ने कहा, HAC की 'रेड लाइन्स' (अहम शर्तें) को न सिर्फ़ पार किया गया, बल्कि उन पर पैर रखा गया, थूका गया और उन्हें जला दिया गया।

अच्छी बात यह रही कि 'हाई एम्बिशन कोएलिशन' पीछे हटने को तैयार नहीं हुआ। NRDC के एक प्रतिनिधि के शब्दों में, “कमज़ोर संधि से बेहतर है कि कोई संधि न हो, क्योंकि कमज़ोर संधि प्रगति का भ्रम पैदा करती है और मज़बूत कार्रवाई को हतोत्साहित कर सकती है।

भले ही ज़्यादातर देशों ने बड़े और असरदार कदमों का समर्थन किया, लेकिन बैठक बिना किसी शुरुआती ड्राफ़्ट के ही खत्म हो गई, जिस पर आगे चर्चा की जा सके।

बातचीत के 2027 में किसी समय फिर से शुरू होने की उम्मीद है, लेकिन यह सोचना मुश्किल है कि वे ज़्यादा सफल क्यों होंगी।

हेजिंग?

बातचीत पर इंडस्ट्री के मिले-जुले हमले को बिना वजह की दादागिरी और ज़रूरत से ज़्यादा प्रतिक्रिया के तौर पर देखना आकर्षक लग सकता है। आख़िरकार, UN की संधियाँ कमज़ोर होती हैं और उन्हें लागू करना मुश्किल होता है, और वैसे भी पेट्रो-स्टेट्स किसी भी ऐसे समझौते पर दस्तख़त करने से इनकार कर सकते थे जो उन्हें पसंद न हो। प्रश्न है कि  सिर्फ़ प्लास्टिक को बचाने के लिए इतनी ज़बरदस्त दखलअंदाज़ी क्यों?

ऑयल इंडस्ट्री की रिसर्चर ऐलिस माह का तर्क है कि फॉसिल फ्यूल की बड़ी कंपनियाँ पेट्रोकेमिकल्स में निवेश को "क्लाइमेट रिस्क से बचने के एक तरीके"  यानी हेजिंग ( हेजिंग (Hedging) का मतलब वित्तीय बाजारों में जोखिम से बचाव या नुकसान को कम करने की एक रणनीति है.इसमें निवेशक अपने मौजूदा निवेश के विपरीत दूसरा निवेश करते हैं ताकि यदि पहले में घाटा हो, तो दूसरे से उसकी भरपाई की जा सक) के तौर पर देखती हैं यानी क्लाइमेट चेंज से नहीं, बल्कि इस जोखिम से बचाव कि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करने की नीतियाँ फॉसिल फ्यूल की बिक्री और मुनाफ़े को कम कर देंगी।

उन्हें इस बात में उम्मीद दिखती है कि, जैसा कि इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी की रिपोर्ट बताती है, प्लास्टिक पहले से ही "तेल की खपत का सबसे तेज़ी से बढ़ने वाला स्रोत" है, और "2030 तक तेल की माँग में होने वाली बढ़ोतरी का एक-तिहाई से ज़्यादा हिस्सा, और 2050 तक लगभग आधा हिस्सा प्लास्टिक का होगा जो ट्रकों, एविएशन और शिपिंग से भी आगे होगा।"  यह संभावना प्लास्टिक की बढ़ोतरी पर रोक लगाने से बचने के लिए सख़्त कदम उठाने को सही ठहराती है।

कई स्वतंत्र पर्यवेक्षकों और NGO का मानना ​​है कि UN की देखरेख में हो रही बातचीत किसी नतीजे पर नहीं पहुँचेगी, और जो देश संधि चाहते हैं, उन्हें अलग से बातचीत करनी चाहिए। इससे वाकई "इच्छुक देशों की संधि" (treaty of the willing) हो सकती है लेकिन अगर सबसे बड़े पेट्रोलियम और प्लास्टिक उत्पादक ही इससे दूर रहें, तो यह कितनी असरदार होगी?

यह तथ्य कि दर्जनों पूँजीवादी सरकारों ने फॉसिल फ्यूल इंडस्ट्री की असीमित बढ़ोतरी की कोशिश का विरोध किया, यह दिखाता है कि प्लास्टिक का संकट कितना गहरा और खतरनाक है। लेकिन संधि की बातचीत की विफलता यह दिखाती है कि वह इंडस्ट्री कितनी ताकतवर है, और अपनी लगातार बढ़ोतरी को बचाने के लिए कितनी दृढ़ है, चाहे उससे कितना भी प्रदूषण क्यों न हो।

(इमेज साभार –Statista )

जब तक हम फॉसिल फ्यूल  कैपिटल की ताकत को नहीं तोड़ते, प्लास्टिक की महामारी फैलती रहेगी।

 (सन्दर्भ -Climate and Capitalism, Links, Outlook business)

जल से संबंधित सूचनाओसमाचारों और सन्दर्भों का संकलनपानी -पत्रक

 पानी पत्रक- 327(01 अगस्त  2026 ) जलधारा अभियान-जयपुर -संपर्क- उपेन्द्र शंकर-7597088300.मेल-jaldharaabhiyan.jaipur@gmail.com. वेबसाइट-जलधारा अभियान -राजस्थान 



 

 

 

 

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