यह रिपोर्ट दिसंबर 2015 में पेरिस समझौते को अपनाने के बाद के अहम दशक में जलवायु संकट से
निपटने के लिए भारत की विधायी (कानूनी) भागीदारी के विकास की जांच करती है। दुनिया
के सबसे बड़े लोकतंत्र और खराब मौसम की घटनाओं के प्रति सबसे ज़्यादा संवेदनशील
देशों में से एक होने के नाते, यह समझना ज़रूरी है कि भारत की
संस्थागत प्रणालियाँ जलवायु से जुड़े वादों को घरेलू राजनीतिक कार्रवाई में कैसे
बदल रही हैं। यह विश्लेषण इस बात पर गौर करता है कि क्या संसदीय जांच देश के बढ़ते
जलवायु जोखिमों के साथ तालमेल बिठा रही है और क्या मौजूदा संसदीय चर्चाएँ उस
महत्वाकांक्षा को दर्शाती हैं जिसकी जलवायु संकट को ज़रूरत है।
यह रिपोर्ट दिसंबर 2015 से दिसंबर 2025 तक की अवधि को कवर करती है, जिसमें लोकसभा और राज्यसभा दोनों में
पूछे गए 8,702 संसदीय सवालों के डेटासेट पर ध्यान
केंद्रित किया गया है। विश्लेषण को आठ मुख्य विषयों में बांटा गया है: स्वच्छ
ऊर्जा और डीकार्बोनाइज़ेशन;
खराब मौसम और प्राकृतिक आपदाएँ; वन और भूमि का उपयोग; जलवायु परिवर्तन और वैश्विक प्रभाव; पर्यावरण; शमन, अनुकूलन और कार्बन प्रबंधन; जलवायु वित्त और बाज़ार; और वैश्विक जलवायु शासन।
मुख्य निष्कर्ष
• कुल मिलाकर, डेटासेट में 8,702 संसदीय सवाल शामिल हैं, जिनमें से 713 तारांकित (starred) और 7,989 अतारांकित (unstarred)
हैं।
• जलवायु परिवर्तन राष्ट्रीय एजेंडे का
एक अपेक्षाकृत छोटा हिस्सा बना हुआ है, जो इस दशक में पूछे गए सभी संसदीय सवालों का केवल 3.3% है।
• विधायी रुचि मुख्य रूप से स्वच्छ ऊर्जा
और डीकार्बोनाइज़ेशन (37.7%)
पर केंद्रित है, जो प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय लक्ष्यों
के अनुरूप है। इसके विपरीत,
जलवायु वित्त (0.3%) और वैश्विक जलवायु संचालन व्यवस्था (1.3%) पर बहुत कम ध्यान दिया गया है।
• जलवायु परिवर्तन के लिए राष्ट्रीय
अनुकूलन कोष (NAFCC), जो कभी कृषि जैसे संवेदनशील क्षेत्रों
के लिए एक प्रमुख योजना थी,
का दर्जा घटा दिया गया और वित्त वर्ष 2023-24 से इसे "गैर-योजना" व्यय के
रूप में पुनर्वर्गीकृत किया गया, और इसके तहत कोई नई परियोजना शुरू नहीं की जानी थी।
• सरकार का हमेशा से यह कहना रहा है कि
"सिर्फ़ वायु प्रदूषण की वजह से मौत या बीमारी होने का सीधा संबंध साबित करने
के लिए कोई पक्का डेटा मौजूद नहीं है।" वे खान-पान और जीवनशैली जैसे दूसरे
कारणों का भी ज़िक्र करते हैं, जिससे स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर को सिर्फ़ वायु प्रदूषण से जोड़ना
मुश्किल हो जाता है।
• सरकार ने एक खास "जलवायु परिवर्तन
कानून" या अलग से एक हाई-पावर कमेटी बनाने के प्रस्तावों को खारिज कर दिया
है। उनका कहना है कि मौजूदा पर्यावरण (संरक्षण) कानून ही काफी है।
• कानून बनाने वालों का ध्यान मुख्य रूप
से किसी घटना के बाद प्रतिक्रिया देने पर होता है, न कि पहले से कोई रणनीति बनाने पर। उदाहरण के लिए, फरवरी 2021 में उत्तराखंड में ग्लेशियर फटने की घटना के बाद ग्लेशियर पिघलने और
बादल फटने से जुड़े सवाल अचानक बढ़ गए। वहीं, 2022 में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी पड़ने के बाद ही संसद में हीटवेव (लू) पर
गंभीरता से चर्चा हुई, जबकि इससे पहले यह एक जानलेवा खतरा
होने के बावजूद नज़रअंदाज़ किया जाता रहा था।
• संसदीय सवालों के विश्लेषण से पता चलता
है कि इनमें पार्टियों के हिसाब से एक साफ़ पैटर्न दिखता है। सत्ताधारी NDA के सदस्य ज़्यादातर ऐसे सवाल पूछते हैं
जिनसे सरकार को अपने कार्यक्रमों की तारीफ करने और PM-KUSUM या ग्रीन हाइड्रोजन जैसे मिशनों पर तकनीकी जानकारी देने का मौका
मिलता है। इसके उलट, विपक्षी पार्टियों के सदस्य योजनाओं को
लागू करने में कमियों, फंड की कमी और नीतियों के असर पर ध्यान
केंद्रित करते हैं।
सांसद जलवायु संकट को सिर्फ़ पर्यावरण
की समस्या के तौर पर नहीं देखते; वे इसे विकास और सामाजिक-आर्थिक मुद्दों—जैसे किसानों की परेशानी, जन स्वास्थ्य और ऊर्जा सुरक्षा—से जोड़कर देखते हैं। हालांकि, निगरानी और जवाबदेही के बीच एक बड़ा
अंतर है:
• सरकार हमेशा तकनीकी उपायों—जैसे 'फ्लड वॉच इंडिया ऐप' और 'वन अग्नि पोर्टल'—को कार्रवाई के सबूत के तौर पर पेश
करती है। लेकिन, अक्सर इनमें काम करने के तरीकों का कोई
मानक पैमाना (बेंचमार्किंग) नहीं होता; उदाहरण के लिए, मंत्रालय ने माना है कि सैटेलाइट से आग पर सटीक नज़र रखने के बावजूद
उनके पास आग बुझाने की कोई ऐसी प्रणाली नहीं है जो राष्ट्रीय स्तर पर प्रमाणित हो।
• सरकार अक्सर संघीय ढांचे का हवाला देकर
आपदा राहत, शहरों में बाढ़ और जंगल प्रबंधन की
ज़िम्मेदारी राज्य सरकारों पर डाल देती है और इन्हें "राज्य का विषय"
बताती है।
• डेटा की कमी अक्सर नीतिगत बचाव का काम
करती है। सरकार कहती है कि वह जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले पलायन, असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों की हीटवेव
से होने वाली मौतों, या जंगल की आग से नष्ट हुए जंगल के
सटीक क्षेत्रफल का कोई केंद्रीय डेटा नहीं रखती है। पेरिस समझौते के दस साल बाद भी, भारत का राजनीतिक ध्यान लगातार बने हुए
खतरों या बढ़ती आर्थिक जोखिमों के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रहा है। हालांकि भारत
ने जलवायु से जुड़े अपने वादों को संस्थागत रूप दे दिया है, लेकिन जलवायु जवाबदेही सुनिश्चित करने
के लिए संसदीय निगरानी अभी तक एक व्यापक तंत्र के रूप में विकसित नहीं हो पाई है; यह लंबी अवधि की तैयारियों की
व्यवस्थित निगरानी करने के बजाय अचानक होने वाली घटनाओं पर प्रतिक्रिया देने तक ही
सीमित है।
(सन्दर्भ /साभार –
Centre for financial accountability -https://cenfa.org)
https://cenfa.org/wp-content/uploads/2026/10/Climate-on-the-Floor-4.pdf
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पानी पत्रक- 338( 04 अक्टूबर 2026 ) जलधारा अभियान-जयपुर -संपर्क- उपेन्द्र
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