गुरुवार, 18 दिसंबर 2025

वेदांता के सिजिमाली माइनिंग प्रोजेक्ट के लिए अवैध भूमि अधिग्रहण के खिलाफ वकीलों का विरोध प्रदर्शन

देश भर से 125 से ज़्यादा वकीलों, कानूनी पेशेवरों (फैकल्टी) और कानून के छात्रों ने ओडिशा के राज्यपाल से तुरंत दखल देने की अपील की है ताकि विरोध कर रहे ग्रामीणों पर हो रहे सरकारी दमन को रोका जा सके और सिजिमाली में बॉक्साइट खनन के लिए वेदांता को सामुदायिक रूप से प्रबंधित वन भूमि सौंपने के मकसद से की जा रही सभी अवैध प्रशासनिक कार्रवाइयों को रोकने के लिए कदम उठाए जाएं।

30 अगस्त 2024 को कांटामल गांव में हुई पहली ग्राम सभा की तस्वीर

देश भर से 125 से ज़्यादा वकीलों, कानूनी पेशेवरों (फैकल्टी) और कानून के छात्रों ने वेदांता लिमिटेड के प्रस्तावित सिजिमाली बॉक्साइट खनन प्रोजेक्ट के लिए ओडिशा के रायगड़ा और कालाहांडी जिलों में वन और पांचवीं अनुसूची की भूमि के अवैध अधिग्रहण और इसका विरोध कर रहे आदिवासी ग्रामीणों के लगातार अपराधीकरण और डराने-धमकाने के खिलाफ देशव्यापी विरोध प्रदर्शन शुरू किया है।

ओडिशा के राज्यपाल, पुलिस महानिदेशक और रायगड़ा और कालाहांडी के जिला कलेक्टरों और पुलिस अधीक्षकों को संबोधित एक विस्तृत याचिका में, वकीलों ने पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में भूमि अधिग्रहण को रोकने, ग्रामीणों के खिलाफ आपराधिक मामले वापस लेने और सिजिमाली में वेदांता के खनन प्रोजेक्ट को सुविधाजनक बनाने के लिए किए जा रहे "औपनिवेशिक-युग के दमन" को रोकने के लिए तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।

वकीलों का यह हस्तक्षेप सिजिमाली क्षेत्र में बढ़ती पुलिस कार्रवाई के बीच आया है, जहां वेदांता की खनन योजनाओं का विरोध कर रहे ग्रामीणों का कहना है कि वे लगभग दो साल से डर के माहौल में जी रहे हैं। 14 दिसंबर को जारी एक प्रेस नोट के अनुसार, ग्रामीणों को बार-बार गिरफ्तारी, दोबारा गिरफ्तारी, हिरासत और धमकियों का सामना करना पड़ा है, जिससे याचिका के अनुसार पूरे क्षेत्र में आतंक का माहौल और कानून के शासन का टूटना हुआ है।

बताई गई सबसे गंभीर घटनाओं में से एक 7 दिसंबर, 2025 को हुई, जब कथित तौर पर आम नागरिकों के कपड़े पहने लोगों ने कासिपुर ब्लॉक के सुंगेर चौक पर दिन दहाड़े गांव के नेताओं का अपहरण करने की कोशिश की। प्रभावित गांवों के नौ से ज़्यादा युवा नेता वर्तमान में रायगड़ा और भवानीपटना की जेलों में बंद हैं, जबकि कई अन्य को कथित तौर पर नियमित रूप से उठाया जा रहा है या गिरफ्तारी की धमकी दी जा रही है।

वकीलों ने कहा, "गांवों में सशस्त्र पुलिस की मौजूदगी ने आतंक का ऐसा माहौल बना दिया है कि लोग अस्पतालों या साप्ताहिक बाजारों में जाने से भी डरते हैं," उन्होंने कहा कि दैनिक आर्थिक गतिविधि लगभग ठप हो गई है। याचिका में बताया गया है कि जब ग्रामीण खनन के लिए अपनी ज़मीन के अवैध इस्तेमाल के बारे में फैसले लेने के लिए इकट्ठा होते हैं, या जब वे ज़रूरी पर्यावरण और वन मंज़ूरी लेने में तय नियमों की अनदेखी का विरोध करते हैं, तो उन्हें पुलिस की ज़बरदस्त बर्बरता का सामना करना पड़ता है।

वकीलों ने गवर्नर को दी गई अपनी याचिका में तर्क दिया है कि माइनिंग लीज ही गैर-कानूनी है, क्योंकि यह पांचवीं अनुसूची वाले इलाके में ग्राम सभाओं की स्वतंत्र, पहले से और सूचित सहमति के बिना दी गई थी। इसमें शामिल लगभग आधी ज़मीन जंगल और समुदाय के कंट्रोल वाली ज़मीन है, जो वन संरक्षण अधिनियम, 1980; पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 (PESA); वन अधिकार अधिनियम, 2006; और उड़ीसा अनुसूचित क्षेत्र अचल संपत्ति हस्तांतरण विनियम, 1956 के तहत सुरक्षित है। ये कानून ज़मीन के किसी भी हस्तांतरण से पहले निवासियों की स्वतंत्र और सूचित सहमति ज़रूरी करते हैं।

प्रेस नोट और वकील की याचिका दोनों में एक मुख्य आरोप यह है कि वेदांता ने प्रशासन के साथ मिलकर नकली ग्राम सभाओं के ज़रिए "सहमति बनाई"। वकीलों के अनुसार, कथित तौर पर 8 दिसंबर, 2023 को रायगड़ा ज़िले के काशीपुर ब्लॉक में सुंगेर ग्राम पंचायत और कालाहांडी ज़िले के थुआमुल रामपुर ब्लॉक में तलामपदर ग्राम पंचायत के गांवों में सशस्त्र पुलिस और कंपनी के कर्मचारियों की मौजूदगी में कम से कम 10 ऐसी ग्राम सभाएं आयोजित की गईं, ताकि ग्रामीणों की कथित सहमति हासिल की जा सके।

याचिका में दावा किया गया है कि 8 फरवरी, 2024 की कालाहांडी ज़िला प्रशासन से मिली RTI के जवाबों से पता चला कि ग्रामीणों को सहमति प्रस्तावों पर अंगूठे के निशान लगाने के लिए मजबूर किया गया, जबकि कंपनी के अधिकारी, सशस्त्र पुलिस और स्थानीय दबंग इन तथाकथित ग्राम सभाओं में मौजूद थे। सभी 10 ग्राम सभाओं को एक ही तारीख और एक ही समय पर सभी 10 गांवों में आयोजित दिखाया गया, जिससे वे जबरदस्ती और 'काल्पनिक' हो गईं, और प्रस्ताव अमान्य हो गए।

याचिका में गवर्नर का ध्यान इस बात पर भी दिलाया गया है कि जनजातीय मामलों के मंत्रालय (MoTA) के नकली ग्राम सभाओं के आरोपों की जांच करने के निर्देशों के बावजूद, अब तक ऐसी कोई जांच शुरू नहीं की गई है।

वकीलों ने ज़िला प्रशासनों पर ओडिशा औद्योगिक बुनियादी ढांचा विकास निगम (IDCO) के लिए लैंड बैंक बनाने का भी आरोप लगाया है, जिसके लिए संरक्षित जंगलों को डी-रिज़र्व किया गया और गोचर और अन्य सामुदायिक ज़मीनों को "बंजर ज़मीन" में बदलकर वेदांता और अन्य कॉर्पोरेट परियोजनाओं के लिए उपलब्ध कराया गया। कंधमाल ज़िले के तिजमाली गांव में, प्रशासन ने कथित तौर पर 30 प्रभावित परिवारों को बिना जानकारी दिए 70 एकड़ से ज़्यादा ज़मीन का अधिग्रहण शुरू कर दिया है। याचिका में तर्क दिया गया है कि यह अधिग्रहण राज्यपाल द्वारा जारी पांचवीं अनुसूची के नियमों का उल्लंघन करता है, जो आदिवासी ज़मीन के हस्तांतरण को रोकने या प्रतिबंधित करने के लिए बनाए गए हैं।

याचिका में ग्राम सभाओं से पहले तैयार की गई एक बहुत ही अधूरी पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) रिपोर्ट की ओर भी इशारा किया गया है, जिसमें कथित तौर पर बारहमासी धाराओं और जल स्रोतों की संख्या कम बताई गई थी और जिस पर सार्वजनिक सुनवाई के दौरान आपत्ति जताई गई थी।

कथित फर्जी ग्राम सभाओं के विपरीत, स्थानीय समुदायों ने सितंबर 2024 में दस विशेष ग्राम सभाएं आयोजित कीं, जहां उन्होंने सर्वसम्मति से वेदांता के खनन प्रस्ताव को खारिज करने का प्रस्ताव पारित किया, जिसमें उन्होंने अपनी ज़मीन, पानी के स्रोतों, जंगलों और आजीविका को होने वाले खतरों का हवाला दिया। जाली हस्ताक्षरों और फर्जी ग्राम सभाओं के संबंध में शिकायतें स्थानीय पुलिस स्टेशनों में दर्ज कराई गईं और स्टेशन डायरी में एंट्री की गईं। हालांकि, कोई FIR दर्ज नहीं की गई। इसके बजाय, याचिका में आरोप लगाया गया है कि पुलिस ने गंभीर दमन किया।

ये तथ्य ओडिशा हाई कोर्ट के सामने एक रिट याचिका [WP(C) No. 3729/2025] में रखे गए थे। 5 मई, 2025 के अपने आदेश में, अदालत ने वन अधिकार अधिनियम के तहत अधिकारों की प्रयोज्यता को दोहराया और केंद्र सरकार को इस पर ध्यान देने का निर्देश दिया। वकीलों ने बताया कि केंद्र सरकार को बाद में दिए गए अभ्यावेदनों पर कोई जवाब नहीं मिला।

याचिका के अनुसार, पिछले दो वर्षों (2023-25) से भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया का विरोध कर रहे गांवों में पुलिस और कंपनी के कर्मचारी लगातार मौजूद रहे हैं। ग्रामीणों का दावा है कि ये ज़मीनें और जंगल सामुदायिक संसाधन हैं, जिनकी पीढ़ियों से खेती और सुरक्षा की जा रही है। विरोध प्रदर्शनों के जवाब में, वे स्थानीय पुलिस द्वारा डराने-धमकाने, उत्पीड़न, हिरासत और गिरफ्तारी के एक पैटर्न का आरोप लगाते हैं।

जून 2025 से, मा माटी माली सुरक्षा मंच के सदस्यों पर BNSS की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा और शांति भंग करने की कार्यवाही लागू की गई है, जो खदान का विरोध करने वाला एक स्थानीय संगठन है। नौ से ज़्यादा प्रमुख कार्यकर्ता वर्तमान में हिरासत में हैं, जिन्हें वकील झूठे आपराधिक मामले बताते हैं, जबकि अन्य को धमकियों और गिरफ्तारियों का सामना करना पड़ रहा है।

याचिका में आगे आरोप लगाया गया है कि वेदांता के इशारे पर पुलिस ने ग्रामीणों का प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों पर मामलों को वापस लेने के बदले में "कंपनी के साथ समझौता करने" के लिए दबाव डाला है। हिरासत में लिए गए कार्यकर्ताओं ने हिरासत में यातना, जातिवादी और नस्लवादी दुर्व्यवहार, और न्यायिक मजिस्ट्रेटों के सामने खुलकर बोलने से रोकने के लिए धमकियों की सूचना दी है।

पुलिस ने कथित तौर पर संयुक्त राष्ट्र विश्व पर्यावरण दिवस, संयुक्त राष्ट्र विश्व स्वदेशी लोग दिवस, और बिरसा मुंडा जयंती जैसे सार्वजनिक समारोहों को रोकने की भी कोशिश की है, यह दावा करते हुए - बिना किसी सबूत के - कि ग्रामीण वेदांता का समर्थन करने वालों को डराने के लिए "हथियारों" के साथ इकट्ठा हो रहे थे। तुरंत कार्रवाई की मांग

याचिकाकर्ताओं ने गवर्नर से वेदांता को समुदाय द्वारा प्रबंधित वन भूमि सौंपने के उद्देश्य से की जा रही सभी कार्रवाइयों को रोकने का आग्रह किया है। याचिका में कहा गया है, "आज़ाद भारत में नागरिकों के साथ औपनिवेशिक काल के स्तर का दमन और निष्पक्ष तथा कानून का पालन करने वाले प्रशासन को जानबूझकर खत्म करने का कोई बहाना नहीं है।"

संविधान की पांचवीं अनुसूची के तहत गवर्नर की विशेष शक्तियों का हवाला देते हुए, वकीलों ने अनुसूचित क्षेत्रों में शांति और सुशासन बहाल करने के लिए तत्काल हस्तक्षेप का आग्रह किया है, इस बात पर ज़ोर देते हुए कि इन संवैधानिक जिम्मेदारियों को कॉर्पोरेट हितों के पक्ष में छोड़ा नहीं जा सकता।

मुख्य मांगों में वेदांता को दी गई खनन लीज़ की समीक्षा, ग्रामीणों के खिलाफ सभी FIR वापस लेना, अवैध गिरफ्तारी और यातना के लिए मुआवज़े के साथ हिरासत में लिए गए नेताओं को रिहा करना, और जब तक ग्राम सभाएं बिना किसी डर के माहौल में फैसले नहीं ले पातीं, तब तक परियोजना से संबंधित सभी कामों को पूरी तरह से रोकना शामिल है।

वकीलों ने पुलिस और प्रशासनिक ज्यादतियों की स्वतंत्र जांच, कंपनी के कर्मचारियों के गांवों में प्रवेश पर प्रतिबंध और क्षेत्र में किसी भी पुलिस तैनाती के लिए ग्राम सभा की मंज़ूरी की भी मांग की है।

जैसे-जैसे ज़मीनी स्तर पर विरोध जारी है, सिजिमाली संघर्ष ओडिशा में आदिवासी अधिकारों की सुरक्षा और कॉर्पोरेट खनन हितों की सेवा में राज्य शक्ति के इस्तेमाल की सीमाओं के लिए एक महत्वपूर्ण परीक्षण मामला बनकर उभरा है।

(सन्दर्भ /साभार –groundxero, countercurrent, pucl,The probe )

धरती पानी  से संबंधित सूचनाओ, समाचारों और सन्दर्भों का संकलन–पानी पत्रक   पानी पत्रक- 272( 19 दिसम्बर 2025 ) जलधारा अभियान,221,पत्रकार कॉलोनी,जयपुर-राजस्थान,302020,संपर्क उपेन्द्र शंकर-7597088300.मेल-jaldharaabhiyan.jaipur@gmail.com



 

  

सोमवार, 15 दिसंबर 2025

मछुआरों ने सरकार से सरकारी जल क्षेत्रों का आवंटन,टेंडर या नीलामी के ज़रिए करने का नोटिफिकेशन वापस लेने को कहा

 पश्चिम बंगाल की मछुआरा सहकारी समितियों ने राज्य के भूमि और भूमि सुधार विभाग से उस नोटिफिकेशन  को रद्द करने की अपील की है, जिसके अनुसार  सरकारी जल क्षेत्रों का आवंटन अब टेंडर या नीलामी के ज़रिए किया जाएगा।उनका कहना है कि इसका पर्यावरण और पारंपरिक मछली पकड़ने वाले समुदायों पर बुरा असर पड़ेगा।

 प.बंगाल के भूमि और भूमि सुधार विभाग द्वारा जारी एक नोटिफिकेशन, जिसमें निजी व्यक्तियों, उद्यमियों और अन्य सरकारी संस्थानों को सरकारी स्वामित्व वाले जल निकायों के लिए प्रतिस्पर्धी बोली में भाग लेने की अनुमति दी गई है, ने आधुनिकीकरण और पारंपरिक आजीविका के संरक्षण और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन पर एक बहस छेड़ दी है।

यह नोटिफिकेशन, जो 800 से अधिक सहकारी समितियों के 17,00,000 से अधिक पंजीकृत सदस्यों की आजीविका को खतरे में डालता है, ने मछुआरा सहकारी समितियों और पर्यावरणविदों से कड़ी प्रतिक्रिया मिली है। चार सहकारी समितियों ने सरकार को पत्र लिखकर नोटिफिकेशन को तुरंत वापस लेने की मांग की है।

18 सितंबर 2025 को पश्चिम बंगाल भूमि और भूमि सुधार नियमावली, 1991 में किए गए संशोधनों में कहा गया है कि सरकार के स्वामित्व वाले जल निकायों का निपटान अब टेंडर या नीलामी के माध्यम से किया जाएगा। हालांकि इसमें कहा गया है कि मछुआरा सहकारी समितियों, मछली उत्पादन समूहों और स्वयं सहायता समूहों को बयाना राशि जमा पर मूल्य वरीयता और छूट मिलेगी, लेकिन पारंपरिक मछुआरों को डर है कि वित्तीय संसाधनों वाले लेकिन स्थायी मछली उत्पादन के लिए आवश्यक कौशल की कमी वाले लोगों द्वारा उन्हें बाहर कर दिया जाएगा।

पर्यावरणविदों को वेटलैंड पर संभावित अतिक्रमण और जल निकाय प्रबंधन पर इसके प्रभाव के बारे में भी चिंता है।

मछुआरों की सहकारी समितियों ने सरकार को प्रतिनिधित्व पत्र सौंपकर अपने जीवन और आजीविका पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों पर प्रकाश डाला है। इन समितियों ने अंतर्देशीय जल निकायों के प्राकृतिक संरक्षक के रूप में अपनी भूमिका और स्थायी मत्स्य पालन प्रथाओं के प्रति अपनी प्रतिबद्धता पर जोर दिया है।

उन्होंने तर्क दिया कि यह नोटिफिकेशन मौजूदा कानूनों और नीतियों के विपरीत है, जिसमें पिछड़े वर्गों को बढ़ावा देने वाले और भारत के संविधान के तहत मौलिक अधिकार शामिल हैं।

दक्षिण बंगा मत्स्य्जीबी फोरम और नेशनल फेडरेशन ऑफ़ स्माल स्केल फिश वर्कर्स कि अगुआई में  अनेक सहकारी समितियों ने विभाग से पर्यावरण और पारंपरिक मछली पकड़ने वाले समुदायों पर इसके हानिकारक प्रभाव का हवाला देते हुए नोटिफिकेशन को रद्द करने का आग्रह किया है।

 इस सन्दर्भ में, प्रकृति और लोगों की रक्षा के लिए अभियान (CDNP) के संयोजक ने अभियान कि तरफ से प.बंगाल की मुख्यमंत्री को पत्र लिखा. पत्र का हिंदी अनुवाद यंहा दिया जा रहा है ----

मुख्यमंत्री

पश्चिम बंगाल सरकार

14.12.2025

आदरणीय मुख्यमंत्री

गज़ट नोटिफिकेशन संख्या 3473(48)/1F-04/2025-GE(M) दिनांक 18.09.2025 को वापस लें

प्रकृति और लोगों की रक्षा के लिए अभियान (CDNP) पश्चिम बंगाल सरकार के हालिया गज़ट नोटिफिकेशन पर गहरी चिंता व्यक्त करता है, जिसमें मछली पकड़ने के लिए सभी "सरकारी जलाशयों" को ठेके पर देने या नीलाम करने और टेंडर/नीलामी की प्रक्रिया को "मछुआरों की सहकारी समितियों, मछली उत्पादन समूहों, स्वयं सहायता समूहों, व्यक्तियों, उद्यमियों और मत्स्य विभाग के सरकारी उपक्रमों" के लिए खोलने की बात कही गई है। मत्स्य सहकारी समितियों,मछली उत्पादन समूहों और स्वयं सहायता समूहों को उद्यमियों और सरकारी उपक्रमों के बराबर रखना उन्हें गंभीर नुकसान पहुंचाएगा। सहकारी समितियों और मछली उत्पादन समूहों के लिए "बोली प्रक्रिया में मूल्य वरीयता और बयाना जमा पर छूट" इस कठोर वास्तविकता को छिपाने के लिए केवल प्रतीकात्मक कदम हैं।

पश्चिम बंगाल में 5.45 लाख हेक्टेयर अंतर्देशीय जल निकाय हैं, जिनमें लगभग 15.3 लाख मछुआरे हैं। इसका मतलब है कि 45 लाख से अधिक लोग अपनी आजीविका के लिए अंतर्देशीय मत्स्य पालन पर निर्भर हैं। यह गज़ट नोटिफिकेशन जल निकायों और मछली संसाधनों पर पारंपरिक मछली पकड़ने वाले समुदायों के अधिकार का उल्लंघन करता है। सार्वजनिक जल निकायों का उपयोग पारंपरिक मछली पकड़ने वाले समुदाय पीढ़ियों से अपनी आजीविका के लिए करते आ रहे हैं। इन जल निकायों में मछली पकड़ना और मछली पालन करना उनके पारंपरिक और प्रथागत अधिकार हैं।

राज्य सरकार के इस फैसले के कारण:

• पारंपरिक अंतर्देशीय मछुआरे स्थानीय जल निकायों में मछली पकड़ने के अपने प्रथागत अधिकार खो देंगे, क्योंकि बाहरी लोग या बिचौलिए नीलामी की बोली जीत जाएंगे। यह सीधे तौर पर उनकी आय के प्राथमिक स्रोत और पोषण सुरक्षा को खतरे में डालेगा।

• कई पारंपरिक मछुआरों को नए ठेकेदारों के लिए कम मजदूरी पर मजदूरों के रूप में काम करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा, जिससे वे अपने काम और संसाधनों पर अपना नियंत्रण और स्वायत्तता खो देंगे।

• पारंपरिक मछली पकड़ने के अधिकारों के नुकसान से परिवारों की आय बर्बाद हो जाएगी और उन पूरे समुदायों की आर्थिक असुरक्षा बढ़ जाएगी जो पीढ़ियों से इन जल निकायों पर निर्भर रहे हैं। इन जल निकायों से स्थानीय

मछुआरों द्वारा पकड़ी गई मछली का एक बड़ा हिस्सा महिला मछली विक्रेताओं द्वारा बेचा जाता है। जलाशयों की नीलामी और उन्हें निजी उद्यमियों को पट्टे पर देने से उनकी और उनके परिवार की आय खत्म हो जाएगी।

• मछली पकड़ना अंतर्देशीय मछुआरा समुदायों के सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने से गहराई से जुड़ा हुआ है। जलाशयों तक पहुंच खोने से उनका सामुदायिक जीवन और सांस्कृतिक विरासत बाधित होगी।

यह फैसला जलाशयों के स्वास्थ्य और पश्चिम बंगाल के पूरे पर्यावरण को भी अपरिवर्तनीय नुकसान पहुंचाएगा।

• निजी ठेकेदारों को नीलामी, जो अक्सर अल्पकालिक लाभ को प्राथमिकता देते हैं, अवैज्ञानिक और गहन मछली पकड़ने के तरीकों को बढ़ावा देगी जो जलीय पारिस्थितिकी तंत्र को खराब करते हैं। इससे मछली का स्टॉक खत्म होने की कगार पर पहुंच जाएगा, और प्राकृतिक खाद्य श्रृंखला बाधित होगी।

• ठेकेदार अपना शिकार बढ़ाने के लिए विनाशकारी मछली पकड़ने के तरीकों का इस्तेमाल करेंगे, जो कई प्रजातियों के लिए प्रजनन स्थल प्रदान करने वाले संवेदनशील आवासों को नष्ट कर देगा।

• गहन जलीय कृषि या मछली पकड़ने के संचालन में अत्यधिक चारा, रसायन और एंटीबायोटिक दवाओं का उपयोग शामिल होगा, जिसका कचरा जलाशय में जमा हो जाएगा। इससे ऐसी स्थितियां पैदा होंगी जो घुली हुई ऑक्सीजन के स्तर को कम कर देंगी, जिसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में मछलियों की मृत्यु होगी और पानी की गुणवत्ता में समग्र कमी आएगी, जो अन्य प्रजातियों और मानव स्वास्थ्य को प्रभावित करेगी।

• आवास विनाश और प्रदूषण से जैव विविधता का नुकसान होगा, क्योंकि विभिन्न जलीय वनस्पति और जीव खराब वातावरण में जीवित नहीं रह पाएंगे।

हम राज्य सरकार को पर्यावरण के संरक्षक के साथ-साथ पारंपरिक मछली पकड़ने वाले समुदायों के आजीविका अधिकारों के प्रति उसके कर्तव्य की याद दिलाते हैं। सरकार को पारंपरिक मछली पकड़ने वाले समुदायों के आजीविका के अधिकार नहीं छीनने चाहिए और जलाशयों को निवेशकों और उद्यमियों को पट्टे पर नहीं देना चाहिए।

हम मांग करते हैं कि राज्य सरकार

1. जलाशयों की खुली नीलामी तत्काल प्रभाव से बंद करे और गजट अधिसूचना वापस ले।

2. सभी पारंपरिक और छोटे पैमाने के मछुआरों और मछली किसानों के सार्वजनिक जलाशयों पर कार्यकाल अधिकारों को मान्यता दे, उन्हें उन जलाशयों में मछली पकड़ने या मछली पालन करने का अधिकार और साथ ही जलाशयों और उनके मछली संसाधनों की रक्षा करने का अधिकार प्रदान करे।

धन्यवाद,

भवदीय

राजेश रामकृष्णन

संयोजक

(सन्दर्भ/साभार –bengalinfor.com,Times of india)

धरती पानी  से संबंधित सूचनाओ, समाचारों और सन्दर्भों का संकलन–पानी पत्रक  पानी पत्रक- 271( 16 दिसम्बर 2025 ) जलधारा अभियान,221,पत्रकार कॉलोनी,जयपुर-राजस्थान,302020,संपर्क उपेन्द्र शंकर-7597088300.मेल-jaldharaabhiyan.jaipur@gmail.com

 

गुरुवार, 11 दिसंबर 2025

मध्य एशिया में बढ़ते जल संकट के बीच रूस ने साइबेरियाई नदियों का रास्ता बदलने की योजना फिर से शुरू की


टाइम्स ऑफ़ सेंट्रल एशिया की रिपोर्ट के अनुसार, रूस में शोधकर्ता एक बार फिर एक योजना का मूल्यांकन कर रहे हैं - जिसे पहली बार एक सदी से भी पहले प्रस्तावित किया गया था - जिसके तहत साइबेरिया की ओब नदी से पानी को मध्य एशियाई देशों में मोड़ा जाएगा, जो वर्तमान में पानी की भारी कमी का सामना कर रहे हैं।

इस प्रस्ताव का मुख्य लाभार्थी उज़्बेकिस्तान होगा, जो क्षेत्रीय जल संकट के केंद्र में है। पानी के खराब मैनेजमेंट, पिघलते ग्लेशियर, जनसंख्या वृद्धि और सिंचाई की मांग के कारण क्षेत्र की 13 प्रतिशत आबादी को सुरक्षित पीने का पानी नहीं मिल पा रहा है।

लगातार सूखे ने स्थिति को और खराब कर दिया है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा नवंबर में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, 1960 के दशक से उज़्बेकिस्तान का औसत वार्षिक तापमान वैश्विक औसत से तीन गुना बढ़ गया है, और प्राकृतिक आपदाओं के कारण देश को हर साल 92 मिलियन डॉलर का नुकसान होता है। पिछले छह साल - 2019 से 2024 तक - "सूखे" माने गए हैं।

UNEP के यूरोप ऑफिस के डायरेक्टर, अर्नोल्ड क्रेइल्हुबर ने एक प्रेस रिलीज़ में कहा, "उज़्बेकिस्तान गंभीर जल संकट, भूमि क्षरण और तापमान में तेजी से वृद्धि का सामना कर रहा है जो वैश्विक औसत से कहीं ज़्यादा है।"

मध्य एशिया से बहने वाली नदियों के 80 प्रतिशत पानी का स्रोत ग्लेशियरों का पिघलना है। कैस्पियन पॉलिसी सेंटर के अनुसार, मौजूदा उत्सर्जन परिदृश्यों के तहत, अगले 25 वर्षों में क्षेत्र के आधे ग्लेशियर पूरी तरह से पिघल जाएंगे, जिससे यह जल संतुलन गंभीर संकट में पड़ जाएगा। उज़्बेकिस्तान और कजाकिस्तान में, प्रमुख नदियों में उनके सामान्य प्रवाह का 40 प्रतिशत से 70 प्रतिशत तक कम हो गया है।

इस बीच, मौजूदा जल संसाधनों का मैनेजमेंट खराब तरीके से किया जाता है। टाइम्स ऑफ़ सेंट्रल एशिया की रिपोर्ट के अनुसार, "कृषि और उद्योग अभी भी पुराने सिंचाई प्रणालियों पर बहुत अधिक निर्भर हैं जो सालाना इस्तेमाल होने वाले पानी का आधा हिस्सा बर्बाद कर देते हैं।"

मई में, विश्व बैंक ने उज़्बेकिस्तान को अपने कृषि और जल निकासी बुनियादी ढांचे को आधुनिक बनाने में मदद करने के लिए 200 मिलियन डॉलर का रियायती ऋण मंजूर किया - यह संरक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है, क्योंकि देश के 80 प्रतिशत जल स्रोत उसकी सीमाओं के बाहर से आते हैं।

यदि ओब नदी के पानी को मोड़ने की योजना को मंजूरी मिल जाती है, तो एक बंद पाइपलाइन प्रणाली के माध्यम से पड़ोसी देशों को एक अनिर्दिष्ट मात्रा में पानी पहुंचाया जाएगा। 1970 में, जब इस योजना को औपचारिक रूप से रूसी राज्य की प्राथमिकता घोषित किया गया था, तब लगभग 6.6 ट्रिलियन गैलन पानी स्थानांतरित करने की कल्पना की गई थी। फिर भी, यह परियोजना पर्यावरणीय प्रभाव और वित्तपोषण के बारे में महत्वपूर्ण सवालों का सामना कर रही है।

(सन्दर्भ /साभार –The times of central Asia, circle of blue )

धरती पानी  से संबंधित सूचनाओ, समाचारों और सन्दर्भों का संकलन–पानी पत्रक  पानी पत्रक- 270( 11 दिसम्बर 2025 ) जलधारा अभियान,221,पत्रकारकॉलोनी,जयपुर-राजस्थान,302020,संपर्क उपेन्द्र शंकर-7597088300.मेल-jaldharaabhiyan.jaipur@gmail.com



                             

पेरिस समझौते के बाद पर्यावरण पर भारत की संसद में चर्चा

( तस्वीर , 1अक्टूबर 2026 को, प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया,नई दिल्ली में "क्लाइमेट ऑन द फ्लोर: इंडियाज़ पार्लियामेंट्री डिस्कोर्स ऑन एनवायरनमेंट...