गुरुवार, 30 मई 2024

पिछले 5 दशकों में, मीठे पानी के प्रवासी मछलियों में,

आई 81 प्रतिशत की गिरावट

एक नई रिपोर्ट से पता चला है कि पिछले कुछ दशकों में मीठे पानी में पाई जाने वाली प्रवासी मछलियों की आबादी तेजी से घट रही है। इनमें सैल्मन, ट्राउट, ईल और स्टर्जन जैसी मछलियां शामिल हैं, जो अपने जीवन के विभिन्न चरणों में लम्बी यात्राएं करती हैं।

यह प्रवासी मछलियां अपने अस्तित्व के लिए मीठे पानी की धाराओं, नदियों पर निर्भर करती हैं। अपने प्रवास के दौरान इनमें से कुछ मछलियां लंबी यात्राएं करती हैं। यह छोटी धाराओं से लेकर बड़ी नदियों तक कभी-कभी तो पूरे महाद्वीप को पार कर उसी धारा में लौट आती हैं, जहां वे पैदा हुई थी।

बता दें कि बहामास के निकट अपने प्रजनन स्थल तक पहुंचने के लिए यूरोपीय ईल दो वर्षों में करीब 10,000 किलोमीटर तक की यात्रा कर सकती है। ऐसे में इन मछलियों की आबादी में आती गिरावट न केवल मीठे पानी के पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचा रही है, साथ ही इसके चलते लाखों लोगों की खाद्य सुरक्षा और जीविका पर भी संकट के बादल मंडराने लगे हैं।

साफ पानी में पाई जाने वाली प्रवासी मछलियों पर जारी लिविंग प्लैनेट इंडेक्स 2024 के नवीनतम अपडेट के मुताबिक 1970 के बाद से मीठे पानी में पाई जाने वाली प्रवासी मछलियों की आबादी में 80 फीसदी से अधिक की गिरावट आई है। मतलब की इनमें हर साल औसतन 3.3 फीसदी की दर से गिरावट आ रही है।

यह इंडेक्स और उससे जुड़ी रिपोर्ट इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएन), जूलॉजिकल सोसाइटी ऑफ लंदन, वर्ल्ड फिश माइग्रेशन फाउंडेशन, द नेचर कन्जर्वेंसी, वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फण्ड और वेटलैंड्स इंटरनेशनल द्वारा जारी की गई है। इस इंडेक्स में मीठे पानी में पाई जाने वाली प्रवासी मछलियों की 284 प्रजातियों को ट्रैक किया गया है।

इस बारे में जारी रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के सभी क्षेत्रों में इन प्रवासी मछलियों की आबादी में गिरावट आ रही है। लेकिन दक्षिण अमेरिका और कैरीबियाई क्षेत्रों में यह सबसे तेजी से घट रही है, जहां पिछले 50 वर्षों में इन प्रजातियों की आबादी में 91 फीसदी की गिरावट आई है। गौरतलब है कि यह वो क्षेत्र है जहां दुनिया में मीठे पानी का सबसे बड़ा प्रवास होता है, लेकिन बढ़ती इंसानी महत्वाकांक्षा के चलते जिस तरह नदियों बांध, खनन और धाराओं को मोड़ने के लिए चलाई जा रही परियोजनाओं के चलते पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचाया जा रहा है वो इन मछलियों की आबादी में गिरावट की वजह बन रहा है।

वहीं यूरोप में मीठे पानी में पाई जाने वाली प्रवासी मछलियों की आबादी में गिरावट का यह आंकड़ा 75 फीसदी दर्ज किया गया है। उत्तर अमेरिका से जुड़े आंकड़ों पर गौर करें तो इनकी आबादी में 35 फीसदी की जबकि एशिया और ओशिनिया में 28 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। हालांकि अफ्रीका में इन मछलियों की क्या स्थिति है, वो आंकड़ों की कमी के चलते स्पष्ट नहीं है।

कौन है इनकी आबादी में आती गिरावट का कसूरवार

रिपोर्ट के मुताबिक पिछले तीन दशकों से इन मछलियों की आबादी में गिरावट की प्रवृत्ति लगातार बनी हुई है। यदि वैश्विक स्तर पर इनकी प्रजातियों के रुझान देखें तो जहां 65 फीसदी प्रजातियों में गिरावट आई है, वहीं 31 फीसदी में वृद्धि हुई है।

इतिहास पर नजर डालें तो यह मछलियां सदियों से प्राकृतिक चुनौतियों से जूझने के बाद भी अपने अस्तित्व को बचाए रखने में सफल रहीं हैं। लेकिन जिस तरह इंसानी गतिविधियों के चलते इनका प्रवासन बाधित हो रहा है उसका खामियाजा इनकी गिरती आबादी के रूप में सामने आ रहा है।

दरअसल, यह प्रवासी प्रजातियां इतनी लंबी दूरी तक यात्राएं करती हैं, ऐसे में उन्हें अपने लंबे सफर के दौरान मानव निर्मित अनगिनत बाधाओं और खतरों से निपटना पड़ता है। ऊपर से बदलती जलवायु और प्रदूषण नई चुनौतियां पैदा कर रहा है।

अपनी यात्रा के दौरान इन जीवों को आराम और भोजन की जरूरत होती है, लेकिन जिस तरह प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहे हैं। उसकी वजह से इन्हें पर्याप्त आहार नहीं मिल पाता। ऐसी स्थिति में थकान और भूख से उनकी मौत हो सकती है।

आंकड़ों की माने तो आज मीठे पानी की करीब एक तिहाई प्रजातियों पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। हालांकि यह खतरा प्रवासी मछलियों पर कहीं ज्यादा है। देखा जाए तो इनके प्रवास के लिए धाराओं, नदियों का उन्मुक्त प्रवाह जरूरी है, लेकिन जिस तरह इन नदियों को नुकसान हो रहा है, बांध जैसी बाधाएं खड़ी की जा रही हैं और प्रवाह में गिरावट आ रही है, वो इनके अस्तित्व के लिए खतरा बन रहा है। उदाहरण के लिए यूरोप में नदियों के उन्मुक्त बहाव की राह में बांध जैसी करीब 12 लाख बाधाएं मौजूद हैं।

इसी तरह नदियों में बढ़ता प्रदूषण, इनका बेतहाशा होता शिकार और जलवायु में आता बदलाव भी इन प्रजातियों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है। नदियों में पानी की उपलब्धता का समय और मात्रा भी इनके प्रवासन के पैटर्न को प्रभावित कर रहा है।

इनकी गिरावट के लिए जिम्मेवार अन्य कारकों में शहरों और उद्योगों से निकला गन्दा पानी और खेतों से बहकर आने वाला पानी जिम्मेवार है, जिसमें हानिकारक कीटनाशक मौजूद होते हैं। इसी तरह जलवायु में आते बदलावों के चलते इनके आवास और पानी की उपलब्धता पर असर पड़ रहा है, जो इनके लिए खतरा बन रहा है।

इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएन) ने अपने एक अन्य विश्लेषण में कहा है कि वैश्विक स्तर पर ताजे पानी में पाई जाने वाली मछलियों की करीब एक चौथाई प्रजातियों पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। यह खतरा प्रवासी प्रजातियों पर कहीं ज्यादा है। वैज्ञानिकों ने पुष्टि की है कि इसके लिए प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन जैसे कारण जिम्मेवार हैं।

ऐसे में रिपोर्ट में इनकी निरंतर निगरानी के साथ-साथ नदियों के उन्मुक्त बहाव को बहाल करने पर जोर दिया है। इनके संरक्षण के प्रयासों पर ध्यान देना भी जरूरी है। साथ ही इन प्रजातियों के प्रवास के दौरान रास्ते में आने वाली बाधाओं को दूर करना भी महत्वपूर्ण है। जलवायु परिवर्तन जो आज पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है, उसके प्रभावों को सीमित करने के लिए उत्सर्जन पर लगाम जरूरी है। इसी तरह बढ़ते प्रदूषण और नदियों की जल गुणवत्ता में आती गिरावट से निपटना न केवल इन प्रजातियों बल्कि स्वयं इंसानों के अस्तित्व के लिए भी बेहद जरूरी है।

                                                                                                ( सन्दर्भ --डाउन टू एअर्थ ,वैज्ञानिक  चेतना  )

पानी से संबंधित सूचनाओ,समाचारों और सन्दर्भों का संकलन –पानी पत्रक                 

पानी पत्रक ( 152-31 मई  2024 ) जलधारा अभियान, 221,पत्रकार कॉलोनी,जयपुर-राजस्थान,302020,संपर्क-उपेन्द्रशंकर-7597088300.मेल-jaldharaabhiyan.jaipur@gmail.com

 


बुधवार, 22 मई 2024

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में पाया गया कि पर्यावरण पत्रकारिता पर हमला हो रहा है

 पिछले 15 वर्षों में 44 लोग मारे गए

  3 मई, 2024 को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर यूनेस्को द्वारा जारी एक नई रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में जलवायु और पर्यावरण पत्रकार बढ़ती हिंसा का सामना कर रहे हैं, पिछले 15 वर्षों में 44 पत्रकार मारे गए हैं।

(पर्यावरण पत्रकार डोम फिलिप्स और स्वदेशी विशेषज्ञ ब्रूनो परेरा की मौत पर 2022 में न्याय के लिए स्वदेशी लोग और मानवाधिकार कार्यकर्ता एक मार्च में शामिल हुए। फ़ोटोग्राफ़: आंद्रे पेननर/ए)

 यह दिन हर 3 मई को एक विशेष थीम के साथ मनाया जाता है। 2024 में विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस की थीम "ए प्रेस फॉर द प्लैनेट: जर्नलिज्म इन द फेस ऑफ द एनवायर्नमेंटल क्राइसिस" है।

 जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता की हानि और प्रदूषण के वैश्विक पर्यावरणीय संकट, दुनिया भर में अरबों लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं और दुनिया इसे कैसे समझती है, इसमें पर्यावरण पत्रकारिता महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। राज्य और निजी अभिनेताओं, साथ ही आपराधिक समूहों को उनकी रिपोर्टिंग को चुप कराने के प्रयास में पत्रकारों को डराने, परेशान करने या यहां तक कि शारीरिक रूप से नुकसान पहुंचाने के लिए जाना जाता है।

 3 मई, 2024 को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर यूनेस्को द्वारा जारी अपनी नई रिपोर्ट प्रेस एंड प्लैनेट इन डेंजर में, ऐसे उदाहरणों का खुलासा किया गया जिसमें पर्यावरणीय मुद्दों पर रिपोर्टिंग करने वाले कम से कम 749 पत्रकारों और समाचार मीडिया आउटलेट्स को हत्या, शारीरिक हिंसा का निशाना बनाया गया।  

2-4 मई 2024 को सैंटियागो, चिली में 2024 विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस वैश्विक सम्मेलन में लॉन्च की गई रिपोर्ट में जोर दिया गया है कि समस्या वैश्विक है, दुनिया के सभी क्षेत्रों के 89 देशों में हमले हो रहे हैं।

 रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में पर्यावरण पत्रकारों को बढ़ती हिंसा का सामना करना पड़ रहा है, पिछले 15 वर्षों में लगभग 44 पत्रकार मारे गए हैं, जिनमें से केवल 5 को दोषी ठहराया गया है - लगभग 90% की चौंकाने वाली दंड दर। हत्याएं एशिया और प्रशांत क्षेत्र में सबसे अधिक 30 मामलों के साथ हुईं, जबकि लैटिन अमेरिका और कैरेबियन में 11 मामले दर्ज किए गए।

रिपोर्ट के अनुसार, 129 देशों के सर्वेक्षण में शामिल कुल 905 पत्रकारों और एजेंसियों में से 70 प्रतिशत से अधिक ने बताया कि उन पर हमला किया गया, धमकी दी गई या दबाव डाला गया। जिन पत्रकारों पर हमला किया गया, वे मुख्य रूप से पर्यावरणीय विरोध, खनन, भूमि संघर्ष, वनों की कटाई, चरम मौसम की घटनाओं, प्रदूषण, जीवाश्म ईंधन उद्योग और पर्यावरणीय क्षति जैसे विषयों पर रिपोर्टिंग कर रहे थे। पर्यावरणीय विरोध, खनन और भूमि संघर्ष को कवर करने वालों को सबसे अधिक हमलों का सामना करना पड़ा। रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि हाल के वर्षों में हमले दोगुने से भी अधिक हो गए हैं, जो 2014-2018 में 85 से बढ़कर 2019-2023 के बीच 183 हो गए हैं। रिपोर्ट से पता चलता है कि कम से कम 194 हमले पर्यावरणीय विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुए, जिनमें से 89 के पीछे पुलिस और सैन्य बल थे।

शारीरिक हमलों के अलावा, सर्वेक्षण में शामिल एक तिहाई पत्रकारों ने कहा कि उन्हें सेंसर किया गया था, और लगभग आधे (45%) ने कहा कि वे पर्यावरण को कवर करते समय खुद पर सेंसर लगा रहे थे, हमला होने के डर से, अपने स्रोतों के उजागर होने के डर से, या किसी कारण से। जागरूकता कि उनकी कहानियाँ संबंधित हितधारकों के हितों से टकराती हैं।

 अध्ययन में पाया गया कि ये हमले पुलिस, सैन्य बलों, सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों और स्थानीय अधिकारियों जैसे राज्य तंत्र की ओर से हुए। इसमें कहा गया है, "निजी अभिनेता - निष्कर्षण उद्योग कंपनियां, आपराधिक समूह, प्रदर्शनकारी और स्थानीय समुदाय - भी हमलों के लिए जिम्मेदार थे।"

 यूनेस्को के महानिदेशक, ऑड्रे अज़ोले ने कहा, “वर्तमान पर्यावरण संकट के बारे में विश्वसनीय वैज्ञानिक जानकारी के बिना, हम कभी भी इस पर काबू पाने की उम्मीद नहीं कर सकते हैं। और फिर भी इस विषय की जांच करने और जानकारी की पहुंच सुनिश्चित करने के लिए हम जिन पत्रकारों पर भरोसा करते हैं, वे पूरी दुनिया में अस्वीकार्य रूप से उच्च जोखिमों का सामना कर रहे हैं, और जलवायु संबंधी दुष्प्रचार सोशल मीडिया पर बड़े पैमाने पर चल रहा है। विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर, हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा और दुनिया भर में पत्रकारों की सुरक्षा के लिए अपनी प्रतिबद्धता दोहरानी चाहिए।

 फरवरी (2024) में इंटरनेशनल प्रेस इंस्टीट्यूट (आईपीआई) द्वारा जारी यह  व्यापक रिपोर्ट, जलवायु और पर्यावरण पत्रकारिता अंडर फायर: जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय गिरावट के स्वतंत्र और स्वतंत्र कवरेज के लिए खतरे, इसके विभिन्न पहलुओं पर गहराई से नज़र डालती है। और, रिपोर्ट प्रेस की स्वतंत्रता के अंतर्निहित खतरों को भी उजागर करती है

(सन्दर्भ –ग्राउंड जीरो,द जकार्ता  पोस्ट ,द डेली मिरर द गार्जयन, )

पानी से संबंधित सूचनाओ,समाचारों और सन्दर्भों का संकलन –पानी पत्रक                 

पानी पत्रक ( 151-22 मई 2024 ) जलधारा अभियान, 221,पत्रकार कॉलोनी,जयपुर-राजस्थान,302020,संपर्क-उपेन्द्रशंकर-7597088300.मेल-jaldharaabhiyan.jaipur@gmail.com

 




गुरुवार, 18 अप्रैल 2024

प्रकृति, लोकतंत्र और युवाओं के बेहतर भविष्य को ध्यान में रखकर करें मतदान

 पर्यावरण संगठनों ने मतदाताओं से की अपील


(यह ऐसा समय है जब मतदाताओं को युवाओं के बेहतर भविष्य के साथ-साथ साफ हवा, पर्यावरण और जल के उनके अधिकार के बारे में सोचना बेहद जरूरी है)

भारत में लोकसभा का चुनावी महाकुम्भ 19 अप्रैल 2024 से शुरू हो रहा है। यह ऐसा समय है जब देशवासी अपने पसंद का नेता चुनने के लिए मतदान की तैयारी कर रहे हैं, लेकिन इस बीच क्या असल मुद्दे उनके जेहन में हैं? यह अपने आप में बड़ा सवाल है।

देश के विभिन्न संगठनों (विशेष कर जल,जंगल ,जमीन और वायु प्रदुषण और पर्यावरण ) ने सभी देशवासियों से अपील की है कि वो मतदान से पहले जीवन की गुणवत्ता में हुई वृद्धि या गिरावट जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर गौर करें। इसके साथ ही इन संगठनों ने पिछले कुछ वर्षों में पर्यावरण, पारिस्थितिकी, रोजगार, नागरिक अधिकार, अभिव्यक्ति की आजादी, लोकतांत्रिक ढांचे आदि के संदर्भ में भी देश, सरकार व राजनैतिक दलों का मूल्यांकन करने का आहवाहन किया है।

इन संगठनों में पर्यावरण, जलवायु, युवा, वन और प्रकृति की सुरक्षा और जागरूकता के मुद्दे पर काम कर रहे संगठन और समूह शामिल हैं। उनके मुताबिक यह ऐसा समय है, जब मतदाताओं को युवाओं के भविष्य के साथ-साथ आने वाले वर्षों में साफ हवा और जल सुरक्षा के उनके अधिकार के बारे में सोचना बेहद जरूरी है, क्योंकि देश पहले ही जलवायु में आते बदलाव, बढ़ता तापमान, जल संकट, अप्रत्याशित बारिश, पिघलते ग्लेशियर और बढ़ता प्रदूषण जैसी अनगिनत समस्याओं से जूझ रहा है।

भारत में पर्यावरण की स्थिति क्या है, इसे हाल ही में 2022 के लिए जारी पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक (ईपीआई) से समझा जा सकता है, जिसमें 180 देशों की लिस्ट में देश को सबसे नीचे रखा गया है। हैरानी की बात है कि इस इंडेक्स में भारत ने कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर बेहद कम स्कोर हासिल किया है।

वहीं दूसरी ओर डेनमार्क, यूनाइटेड किंगडम और फिनलैंड जैसे देश हैं, जिन्होंने इस मामले में सबसे बेहतर प्रदर्शन किया है। इन देशों ने पर्यावरण की सुरक्षा, जैव विविधता और आवास को संरक्षित करने के साथ प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करने वाली नीतियों में लंबे समय से निरंतर निवेश किया है।

बढ़ते प्रदूषण और जल संकट जैसी समस्याओं से जूझ रहा है देश

भारत जो सबसे निचले पायदान पर है, वो वायु गुणवत्ता में आती गिरावट, तेजी से बढ़ता उत्सर्जन, भूजल में गिरावट, प्रदूषण और पानी की कमी से सूखती नदियां और जल स्रोतों के साथ हर जगह लगते कचरे के पहाड़ जैसी पर्यावरण सम्बन्धी अनगिनत चुनौतियों से जूझ रहा है। इतना ही नहीं ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति सबसे संवेदनशील देशों में से भी भारत एक है।

इसमें कोई दोराय नहीं की आज हमारा देश भारी जल संकट का सामना कर रहा है, हमारे 70 फीसदी भूजल स्त्रोत सूख चुके हैं। वहीं इनके पुनर्भरण की दर 10 फीसदी से भी कम रह गई है। चेन्नई, बेंगलुरु जैसे शहर पहले ही पानी की कमी को लेकर सुर्खियों में हैं। वायु गुणवत्ता का आलम यह यह कि स्विस वायु गुणवत्ता निगरानी संगठन आईक्यू एयर ने अपनी रिपोर्ट में भारत को 2023 का तीसरा सबसे प्रदूषित देश घोषित किया है। बता दें कि इससे पहले 2022 में भारत इन देशों में आठवें स्थान पर था। विडम्बना देखिए कि दुनिया के 50 सबसे प्रदूषित शहरों में से 42 भारत में हैं।

हैरानी की बात है कि पर्यावरण की गुणवत्ता में निरंतर आती गिरावट के बावजूद देश में पर्यावरण और प्राकृतिक प्रणालियों की रक्षा के लिए बनाए कई कानून पिछले कुछ वर्षों में बदलावों के चलते कमजोर हुए हैं। हालांकि इसको लेकर व्यापक तौर पर जन विरोध भी हुए हैं।

उत्तर में हिमालय और अरावली में हमारे जल, जंगल, नदियां, पहाड़ और रेगिस्तान इंसानी प्रभावों के चलते गिरावट का सामना कर रहे हैं। ऐसा ही कुछ भारत के मध्य और पूर्वी क्षेत्रों में देखने को मिला है, इनमें हसदेव वन क्षेत्र शामिल हैं। वहीं निकोबार द्वीप समूह और पश्चिमी घाट में पुरातन वर्षावनों का बड़े पैमाने पर दोहन किया गया है।

इन क्षेत्रों में बांध परियोजनाओं के साथ-साथ बड़े स्तर की अन्य संरचनाओं का निर्माण किया गया है। इसी तरह कोयला, पत्थर और रेत खनन ने इन क्षेत्रों का बड़े पैमाने पर दोहन किया है। ऐसे में विषम परिस्थितियों में इन संगठनों ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर देश के विभिन्न राजनीतिक दलों व नेताओं से पर्यावरण को बचाने की मांग की है। उनकी मांग है कि हमारी प्राकृतिक और लोकतांत्रिक विरासत की सुरक्षा के लिए नई प्रतिबद्धता और संवाद जरूरी है।

उन्होंने भारत में 'विकास' की परिभाषा में बदलावों की बात भी करी है। उनका कहना है कि हमारे प्राकृतिक संसाधनों की कीमत पर विकास नहीं होना चाहिए। इससे प्रदूषण को नियंत्रित करने वाले हमारे प्राकृतिक प्रणाली का विनाश हो रहा है। वहीं पानी का गहराता संकट हमारे युवाओं और वन्यजीवों के भविष्य के लिए खतरा बन रहा है, जिससे निपटना जरूरी है।

उनकी मांग है कि हिमालय, अरावली, पश्चिमी और पूर्वी घाटों, तटीय क्षेत्रों, आर्द्रभूमियों, नदी घाटियों, मध्य भारतीय और उत्तर-पूर्वी वन क्षेत्रों में पारिस्थितिक तंत्र और सामुदायिक आजीविका की सुरक्षा सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है। उन्होंने प्राकृतिक क्षेत्रों में कॉर्पोरेट शोषण पर रोक लगाने पर जोर दिया है।

उन्होंने स्थानीय और राष्ट्रीय विकास से जुड़ी सभी निर्णय प्रक्रियाओं में समुदाय और नागरिक समाज को मुख्य रूप में शामिल करने पर जोर दिया है। उनका कहना है कि प्रकृति और उस पर निर्भर समुदाय के अधिकारों के साथ-साथ हमारी भावी पीढ़ियों के अधिकारों को सभी विकास योजनाओं के मूल सिद्धांत के रूप में बनाए रखा जाना चाहिए। उनके मुताबिक ग्राम सभा की सहमति के बिना वन व कृषि भूमि में कोई बदलाव नहीं किया जाना चाहिए।

पर्यावरण एवं प्रकृति के संरक्षण के लिए इन संगठनों ने मांग की है कि 2014 के बाद से पर्यावरण और वन अधिनियमों को कमजोर करने वाले सभी प्रावधानों को बदला जाना चाहिए।

बंद होना चाहिए पर्यावरण को ताक पर रख होता विकास

वहीं पर्यावरण संरक्षण एवं जैव विविधता अधिनियम, वन अधिकार कानून, के साथ प्रकृति और मूल निवासियों के अधिकारों को बनाए रखने वाले सभी कानूनों का पूर्ण और प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। उनकी यह भी मांग है कि सभी आर्द्रभूमियों को आर्द्रभूमि (संरक्षण एवं प्रबंधन) नियम, 2010 के तहत अधिसूचित किया जाना चाहिए।

 उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया है कि भारत में सूख चुकी सभी नदियों, जोहड़ों, झीलों, तालाबों और अन्य जल निकायों को पुनर्जीवित किया जाना चाहिए। साथ ही हमारे देश की जल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पारंपरिक ज्ञान का उपयोग करके जल पुनर्भरण के लिए युद्ध स्तर पर काम किया जाना चाहिए।

हिमालय, अरावली और पश्चिमी घाटों में नदियों को जोड़ने वाली परियोजनाओं, बांध निर्माण, सुरंग बनाने के लिए किए जाने वाले विस्फोटों और हमारे पहाड़ों को काटने वाली सभी परियोजनाओं पर रोक लगाईं जानी चाहिए और इन परियोजनाओं को शुरू करने से पहले उनके प्रभावों का मूल्याङ्कन करने और इनके लिए आम लोगों की राय ली जानी चाहिए।

संपूर्ण भारत में शहरीकरण, बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाओं और व्यवसायीकरण के लिए भूमि उपयोग में बदलाव से पहले क्षेत्रों को ध्यान में रखते हुए विशिष्ट आपदा और क्लाइमेट रिस्क अध्ययन को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए।

इसी तरह पहाड़ों पर होते खनन को रोकने के लिए निर्माण गतिविधियों में सतत और वैकल्पिक निर्माण सामग्री के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए नीतियों का तत्काल कार्यान्वयन होना चाहिए। इसी तरह जंगल और आवास क्षेत्रों के आसपास होने वाली सभी खनन गतिविधियों को रोका जाना चाहिए। ताकि इसके लिए किए जाने वाले विस्फोट और खनन गतिविधियों के चलते स्थानीय समुदायों और वन्यजीवों के स्वास्थ्य पर बुरा असर न पड़े और वो सभी शांति से रह सके। इसी तरह प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को हमारी भावी पीढ़ियों के लिए संजोया जा सके।

इन संगठनों ने ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमों को नियमों को सख्ती से लागू करने पर भी जोर दिया है। उनकी मांग है कि सभी शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में सीवेज और अपशिष्ट जल के सुरक्षित उपचार, पुनर्चक्रण और निर्वहन के लिए एसटीपी और ईटीपी स्थापित किए जाने चाहिए।

उनका कहना है कि हम भारतीयों को यह नहीं भूलना चाहिए कि वास्तव में सुशासन, नीति निर्माण में जनता की भागीदारी को सुनिश्चित करता है। साथ ही यह भ्रष्टाचार और नियमों की अनदेखी को कम करता है। यह एक तरफ जहां प्रेस की आजादी में मददगार होता है साथ ही सार्वजनिक बहस का भी समर्थन करता है। यह पर्यावरण संरक्षण सुनिश्चित करने के लिए जन प्रतिनिधियों के साथ-साथ नागरिकों को भी प्रोत्साहित करता है। सबके साथ से ही देश एक बेहतर कल और सतत एवं न्यायसंगत विकास की राह में आगे बढ़ सकता है।

मतदान सिर्फ राजनैतिक दलों और नेताओं का महज चयन ही नहीं यह प्रकृति की सुरक्षा, बेहतर कल, सभी नागरिकों के संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकारों की गारंटी और भारत के युवाओं के लिए एक सुरक्षित भविष्य की कुंजी भी है।

( सन्दर्भ –डाउन टू अर्थ )

पानी से संबंधित सूचनाओ,समाचारों और सन्दर्भों का संकलन –पानी पत्रक                 

पानी पत्रक ( 150-19 अप्रैल 2024 ) जलधारा अभियान, 221,पत्रकार कॉलोनी,जयपुर-राजस्थान,302020,संपर्क-उपेन्द्रशंकर-7597088300.मेल-jaldharaabhiyan.jaipur@gmail.com


पेरिस समझौते के बाद पर्यावरण पर भारत की संसद में चर्चा

( तस्वीर , 1अक्टूबर 2026 को, प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया,नई दिल्ली में "क्लाइमेट ऑन द फ्लोर: इंडियाज़ पार्लियामेंट्री डिस्कोर्स ऑन एनवायरनमेंट...