कोलंबिया के निवर्तमान राष्ट्रपति गुस्तावो पेट्रो, जो पहले गुरिल्ला लड़ाके थे और देश के पहले वामपंथी नेता भी, 2022 में सत्ता में आए। उन्होंने कुछ ऐसा करने का वादा किया था जिसकी कोशिश जीवाश्म ईंधन (fossil fuel) पैदा करने वाले देशों के बहुत कम नेताओं ने गंभीरता से की है: अपने देश की तेल, गैस और कोयले पर निर्भरता कम करना।
अपनी उपराष्ट्रपति फ्रांसिया मार्केज़
(जो पहले पर्यावरण कार्यकर्ता थीं) के साथ मिलकर, पेट्रो ने कोलंबिया को संसाधनों के दोहन (resource extraction) पर कम निर्भर बनाने के लिए एक
महत्वाकांक्षी योजना बनाई। उनका ध्यान आर्थिक विविधता, नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा प्रणालियों पर अधिक लोकतांत्रिक
नियंत्रण और पर्यावरण संरक्षण पर था। तेल और गैस के घटते भंडार और जलवायु परिवर्तन
पर कार्रवाई न करने की बढ़ती लागत को देखते हुए, जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करना बहुत ज़रूरी हो गया है।
चार साल बाद अगस्त 2026
में,जब पेट्रो कोलंबियाई कानून के तहत अधिकतम एक कार्यकाल पूरा करने के
बाद पद छोड़ने की तैयारी कर रहे थे ,तो उनकी सरकार दुआरा इस दिशा में किये
प्रयासों के नतीजे मिले-जुले रहे, ऐसा माना जा रहा है । उनकी सरकार ने महत्वपूर्ण
प्रगति की, खासकर नवीकरणीय और सामुदायिक ऊर्जा के
क्षेत्र में। लेकिन उनके कई सबसे महत्वाकांक्षी सुधारों को राजनीतिक विरोध, संस्थागत सुस्ती और जीवाश्म ईंधन से
होने वाली आय के लगातार महत्व के कारण नुकसान पहुँचा।
यह अनुभव कोलंबिया से कहीं आगे भी
मायने रखता है। ग्लोबल साउथ (विकासशील देशों) में, सरकारें इस बढ़ती बहस का सामना कर रही हैं कि क्या जीवाश्म ईंधन पैदा
करने वाले देशों को विकास और कम-कार्बन वाली ऊर्जा की ओर बढ़ने के लिए संसाधनों का
दोहन जारी रखना चाहिए, या पूरी तरह से दोहन-आधारित मॉडल से
दूर हटना शुरू कर देना चाहिए। कोलंबिया ने दूसरे दृष्टिकोण का अब तक का सबसे
स्पष्ट परीक्षण प्रस्तुत किया है।
इस बहस का महत्व हाल ही में कोलंबियाई
शहर सांता मार्टा में नीदरलैंड के साथ मिलकर आयोजित 'जीवाश्म ईंधन से दूर जाने पर पहले
सम्मेलन' (First
Conference on Transitioning Away from Fossil Fuels) में उजागर हुआ। पेट्रो के पद छोड़ने से
कुछ समय पहले आयोजित इस कार्यक्रम में कोलंबिया ने खुद को जीवाश्म-बाद के विकास (post-fossil development) में एक वैश्विक नेता के रूप में
स्थापित करने का प्रयास किया। यह कार्यक्रम ब्राजील में संयुक्त राष्ट्र के COP30 जलवायु शिखर सम्मेलन के छह महीने बाद
हुआ, जिसमें जीवाश्म ईंधन के मुद्दे से
गंभीरता से निपटने में विफलता मिली थी।
यह इस बात का आकलन करने का अवसर भी
प्रदान करता है कि पेट्रो की सरकार ने वास्तव में क्या हासिल किया - और क्या चीजें
इसकी राह में बाधक बनीं। शिक्षाविद अक्सर उनके दृष्टिकोण को
"पोस्ट-एक्सट्रैक्टिविस्ट" (दोहन-बाद का दृष्टिकोण) बताते हैं - यह
विचार कि विकास अब जीवाश्म ईंधन और खनन के विस्तार पर निर्भर नहीं होना चाहिए, बल्कि इसके बजाय उस दिशा में काम करना
चाहिए जिसे पेट्रो ने "जीवन के लिए अर्थव्यवस्था" (economy for life) कहा है। पेट्रो का अनुभव उन चुनौतियों
को उजागर करता है जिनका सामना अन्य देश भी इसी रास्ते पर चलने की कोशिश करते समय
कर सकते हैं। बहुत ज़्यादा रिन्यूएबल एनर्जी.
कोलंबिया को पारंपरिक रूप से अपनी
ज़्यादातर बिजली हाइड्रोपावर से मिलती रही है। हालाँकि, बड़े बांधों से होने वाले पर्यावरणीय
नुकसान और जलवायु परिवर्तन व अल नीनो की वजह से पड़ने वाले सूखे के कारण, पेट्रो सरकार विंड और सोलर एनर्जी को
बढ़ावा देने की इच्छुक थी।
जब 2022 में पेट्रो चुने गए, तो हाइड्रो के अलावा अन्य रिन्यूएबल स्रोतों से कोलंबिया की बिजली
उत्पादन क्षमता का 2% से भी कम हिस्सा आता था। 2025 के अंत तक, यह बढ़कर 15% हो गया, जिसका मुख्य कारण नई सोलर परियोजनाएँ थीं। रिन्यूएबल एनर्जी में यह
बड़ी बढ़ोतरी निवर्तमान राष्ट्रपति की जलवायु से जुड़ी सबसे ठोस उपलब्धि हो सकती
है।
हालाँकि, पेट्रो की सरकार ने यह भी माना कि रिन्यूएबल एनर्जी का विकास भी उसी
तरह असमानता पैदा कर सकता है जैसे फॉसिल फ्यूल (जीवाश्म ईंधन) के मामले में होता
है, जहाँ मुनाफा तो कमा लिया जाता है लेकिन
स्थानीय लोगों को इसका लाभ नहीं मिल पाता। इसलिए, सरकार ने गरीबी, संघर्ष या कोयले पर निर्भरता से प्रभावित क्षेत्रों के लिए कम्युनिटी
एनर्जी स्कीम के ज़रिए ऊर्जा उत्पादन को लोकतांत्रिक बनाने की कोशिश की। लगभग 18,000 समूहों ने इसमें रुचि दिखाई और करीब 1,000 समूह सरकार समर्थित ट्रेनिंग
प्रोग्राम में शामिल हुए।
फॉसिल फ्यूल से जुड़ी चुनौतियाँ
लेकिन इन सबके बावजूद, सरकार फॉसिल फ्यूल के विकास की गति को
धीमा करने में संघर्ष करती रही। पेट्रो प्रशासन ने फ्रैकिंग पर रोक लगाने, माइनिंग, तेल, गैस और कोयले के लिए नए एक्सप्लोरेशन
लाइसेंस बंद करने और गैसोलीन पर सब्सिडी खत्म करने का वादा किया था। इन कदमों का
फॉसिल फ्यूल इंडस्ट्री की ओर से कड़ा विरोध हुआ। लेकिन 2022 के अंत तक लगभग 380 कॉन्ट्रैक्ट पहले ही शुरू हो चुके थे।
कुछ सफलताओं के बावजूद, चल रहे उत्पादन को रोकने की गुंजाइश
बहुत कम थी। इस बीच, सरकार डीजल जैसी अन्य फॉसिल फ्यूल
सब्सिडी को पूरी तरह खत्म करने में भी नाकाम रही।
इन सुधारों को लागू करना राजनीतिक रूप
से मुश्किल साबित हुआ। संसद में बहुमत न होने, देश की संवैधानिक अदालत द्वारा नीतिगत फैसलों को रद्द करने और पेट्रो
प्रशासन के भीतर राजनीतिक अस्थिरता के कारण ये सुधार कमजोर पड़ गए। मंत्रियों और
वरिष्ठ अधिकारियों का अक्सर तबादला होता रहा और योजनाएँ व प्राथमिकताएँ भी बदलती
रहीं।
ऐसे में, यह हैरानी की बात नहीं है कि पेट्रो प्रशासन ने अक्सर आदेशों या
अस्थायी फैसलों के ज़रिए फॉसिल फ्यूल के इस्तेमाल को धीमा करने की कोशिश की, जैसे कि ऐसे भौगोलिक क्षेत्रों की
घोषणा करना जहाँ माइनिंग परमिट नहीं दिए जा सकते। हालाँकि, भविष्य की सरकार इन फैसलों को आसानी से
पलट सकती है, जिससे लंबे समय तक इन्हें बनाए रखना
मुश्किल हो जाता है।
एक बड़ी नाकामी यह रही कि कई कोशिशों
के बावजूद फ्रैकिंग पर रोक लगाने वाला कानून पास नहीं हो सका। एक और उदाहरण देखें , बड़े पैमाने पर कोयले की ओपन-पिट
माइनिंग (खुली खदानों से कोयला निकालने) के नए प्रोजेक्ट्स पर रोक लगाने की
कोशिशों को देश के नेशनल डेवलपमेंट प्लान से हटा दिया गया।
फॉसिल फ्यूल (जीवाश्म ईंधन) के
इस्तेमाल को खत्म करने की दिशा में आगे बढ़ने के लिए समर्थन जुटाने में पेट्रो को
कुछ ऐसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा जो खास तौर पर कोलंबिया से जुड़ी थीं: जैसे
उनकी पार्टी की राजनीतिक स्थिति, या फिर अमेरिकी सेना के दखल का खतरा।
लेकिन ग्लोबल साउथ के दूसरे देशों में
भी ऐसी ही कई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। इनमें शामिल हैं - फॉसिल फ्यूल
लॉबी का मजबूत असर, माइनिंग जैसे उद्योगों से लगातार होने
वाली कमाई, अपनी नौकरियों या बिजली की कमी को लेकर
लोगों की चिंता, स्थानीय स्तर पर तुरंत ज़रूरी ज़रूरतों
और सरकारी कार्रवाई की रफ़्तार के बीच तालमेल की कमी, और सरकारी तंत्र की सुस्ती।
पेट्रो,फिर भी , रिन्यूएबल एनर्जी
(नवीकरणीय ऊर्जा) को बढ़ाने, नए कम्युनिटी एनर्जी प्रोग्राम शुरू करने और फॉसिल फ्यूल के इस्तेमाल
को धीरे-धीरे खत्म करने के मुद्दे को पॉलिसी एजेंडा में शामिल करने में कामयाब
रहे। उन्हें ऐसे कानून पास कराने में
मुश्किल हुई जो इन बदलावों को पक्का कर सकें या फॉसिल फ्यूल से होने वाली कमाई पर
सरकार की निर्भरता को खत्म कर सकें।
पेट्रो के सुधार कितने समय तक टिकेंगे, यह काफी हद तक इस बात पर निर्भर करता, कि
उनकी जगह कौन लेता।शुरुआती नतीजों के मुताबिक, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप
का समर्थन पाने वाले दक्षिणपंथी करोड़पति एबेलार्डो डे ला एस्प्रिएला ने कोलंबिया
का राष्ट्रपति चुनाव जीत लिया है। 21 जून 2026, रविवार को हुए रन-ऑफ में डे ला
एस्प्रिएला की जीत से पेट्रो के दौर की आर्थिक, विदेशी और घरेलू नीतियों में बड़े
बदलाव का रास्ता साफ हो जाएगा।
लेकिन कोलंबिया का अनुभव उन दूसरे
देशों के लिए पहले से ही अहम सबक देता है जो फॉसिल फ्यूल से दूर हटकर विकास के
वैकल्पिक मॉडल बनाना चाहते हैं।
(सन्दर्भ /साभार –Climate
action network, Global fight to end fossil fuels, The conversation, Oxford
energy network)
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पानी पत्रक- 322(27 जून 2026 ) जलधारा अभियान-जयपुर -संपर्क- उपेन्द्र शंकर-7597088300.मेल-jaldharaabhiyan.jaipur@gmail.com. वेबसाइट-जलधारा अभियान
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